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बड़े प्रदेश में राहुल की छोटी यात्रा

By Shakti Prakash Shrivastva on January 8, 2023
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

बेशक कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की भारत जोड़ों यात्रा का आधिकारिक उद्देश्य देश के मौजूदा हालात से देशवासियों को परिचित कराते हुए देश को मजबूत बनाना है। लेकिन उसका छुपा हुआ महत्वपूर्ण सियासी उद्देश्य देश को बीजेपी जैसी पार्टी के शासन से मुक्ति की राह प्रशस्त करते हुए कांग्रेस पार्टी को उसके स्वर्णिम अतीत की ओर वापस ले जाना है। सियासत के जानकार कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की वापसी के प्रयास के रूप में भी देख रहे है। इस यात्रा के जरिये राहुल गांधी पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं से सीधे जुड़ना चाहते हैं। हालांकि इतने महत्वपूर्ण उद्देश्य को साधने वाले इस भारत जोड़ो यात्रा के रूटमैप में देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के महज तीन जिलों को ही शामिल करना कई सियासी सवाल खड़े करता है। वो भी इन तीन जिलों में तीन दिनी यात्रा एक छोटी प्रतीकात्मक यात्रा सरीखा ही रहा। हालांकि इस संदर्भ में कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी के अपने तर्क हैं। लेकिन सियासत के दिग्गज इसके निहितार्थ बखूबी समझते हैं। उनका मानना है कि प्रदेश में मजबूती से अपना दूसरा कार्यकाल बिता रही योगी सरकार में उनकी यात्रा को बहुत माइलेज नहीं मिलता लिहाजा कांग्रेस ने इस यात्रा को प्रतीकात्मक छोटी यात्रा के रूप मे रखा। क्योंकि उन्हे इस बात का यकीन है जो माइलेज उनकी इस छोटी सी यात्रा में मिलेगी उससे अधिक पूरे प्रदेश में भ्रमण पर भी नही मिलता। हुआ भी ऐसा ही। राहुल के गाजियाबाद, बागपत और शामली जिलों से होकर गुजरी यात्रा में जनसहभागिता से कांग्रेस खुश होने का दिखावा कर रही है। भले ही कांग्रेस अपने यात्रा रूट को लेकर कुछ भी स्पष्टीकरण दे लेकिन सियासी विशेषज्ञ यात्रा के दौरान यूपी को अहमियत न देने को कांग्रेस की राजनीतिक अदूरदर्शिता और रणनीतिक चूक मानते हैं। उनका मानना है कि जब राहुल 2024 के लोकसभा चुनाव के बाबत अपना व पार्टी का एकतरह से आकलन करने निकले थे तो उन्हे यूपी में अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही कांग्रेस को संजीवनी देने के लिए अवश्य समय देना चाहिए था। केंद्र की सत्ता तक पहुँचने के लिए अकेले अस्सी लोकसभा सीटों का समर्थन देने वाले राज्य को उन्हे कत्तई ऐसे इग्नोर नही करना चाहिए था। दिल्ली के नजदीक होते हुए भी लखनऊ की सत्ता कांग्रेस से लगभग साढ़े तीन दशक से दूरी बनाए हुए है। कांग्रेस के रणनीतिकारों के ऐसे ही निर्णयों के चलते उसके सवर्ण, मुस्लिम, दलित, पिछड़े जैसे कोर वोटर उससे दूर जा चुके हैं। कोई बीजेपी तो कोई सपा, बीएसपी या किसी छोटी पार्टियों के गोद में जा बैठे हैं। ऐसे में जब राहुल स्वयं पिछला चुनाव अमेठी से हार चुके हैं। 2022 लोकसभा की 80 में सिर्फ एकमात्र सोनिया गांधी ही अपनी सीट जीत सकी। विधानसभा चुनाव में बहन प्रियंका पूरी ताकत झोंकने के बाद भी जनसभाओं की भीड़ को वोट में तब्दील करने में नाकामयाब रही। जो दो सीटे प्रतापगढ़ के रामपुर खास से आराधना मिश्रा मोना और महराजगंज के फरेंदा से वीरेंद्र चौधरी जीते भी तो उनमें पार्टी की बजाय उम्मीदवारों के व्यक्तिगत प्रभाव अहम थे। ऐसे में अगर राहुल गांधी ऐसे निर्णय ले रहे है तो ऐसा लगता है कि फिलहाल वो यूपी के बगैर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करना चाहते है।

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