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छोटे राजनीतिक दल : समाज हित की बजाय परिवार हित को तवज्जो

By Shakti Prakash Shrivastva on March 13, 2022
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

        उत्तर प्रदेश की राजनीतिक में तेजी से क्षेत्रवार प्रभाव रखने वाले छोटे-छोटे राजनीतिक दलों का महत्व बढ़ रहा है। चुनाव दर चुनाव इनके प्रभाव में इजाफा हो रहा है। इन दलों की सच्चाई ये है कि ये अपने जाति या वर्ग के प्रभाव वाले इलाकों में जाति के रहनुमा के तौर पर अपनी पहचान रखते है। समाज विशेष को इस बात का भरोसा दिलाते हैं कि सत्ता मिलते ही समाज की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा के बाबत अवसर पैदा किये जाएंगे। इससे समाज के लोगों को भला होगा। जबकि जमीनी हकीकत ये है कि जब सत्ता मिलती है तो ये समाज से किये गए वायदे को भूल अपने परिवार तक सिमट जाते है और सारी प्राप्त ऊर्जा समाज की बजाय परिवार के संरक्षण-संवर्धन में लगा देते हैं। 2022 के हालिया विधानसभा चुनाव में ही देखिए। बीजेपी के साथ निषाद पार्टी, अपना दल (एस) और सपा के साथ सुभासपा, अपना दल (कमेरावादी) जैसे प्रमुख दलों ने साझेदारी में चुनाव लड़ा। इनमे भी टिकट वितरण में समाज की बजाय परिवार के सदस्यों को ही तवज्जो दी गई। समझने के लिए उदाहरण के तौर पर निषाद पार्टी को ही लें। ये पार्टी निषाद समाज के उत्थान के लिए राजनीति में आई। लेकिन जब समाज के लोगों को आगे बढ़ाने का अवसर मिला तो पार्टी ने अपने परिवार के सदस्यों को ही आगे करने का काम किया। पार्टी अध्यक्ष डॉ संजय निषाद अपने एक बेटे प्रवीण निषाद को खलीलाबाद (संत कबीर नगर) से बीजेपी का सांसद बनाने में सफल रहे। पुनः अवसर मिला तो स्वयं ही विधान परिषद सदस्य बन गए। विधानसभा चुनाव आया तो अपने दूसरे बेटे को भी बीजेपी के सिंबल पर चौरीचौरा (गोरखपुर) का विधायक बनवा दिया। ऐसा नहीं कि इस तरह परिवार उत्थान करने में सफल सिर्फ डॉ निषाद ही नहीं है। इस बार सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर भी पिछले चुनाव 2017 में बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लडे और सरकार बनने पर मंत्री बन गए। बेटे अरविन्द को राज्यमंत्री का दर्ज दिला दिए। अपना दल (एस) की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल भी इसी रास्ते पहले से चलती हुई बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ी, सांसद फिर दो-दो बार मंत्री बनी। मौजूदा केंद्र सरकार में भी मंत्री हैं। विधानसभा  चुनाव में दोबारा सत्ता में आनेवाली बीजेपी सरकार में अपने पति के लिए राजनीतिक गोट बिछा रही हैं। यही हाल अनुप्रिया पटेल की माँ कृष्णा पटेल की पार्टी अपना दल (कमेरावादी) का भी है। वो भी टिकट बांटते समय अपने कुनबे को ही आगे रखती है। इस बार अनुप्रिया की बहन पल्लवी पटेल को उन्होंने सिराथु (कौशांबी) से कद्दावर बीजेपी नेता केशव प्रसाद मौर्य को शिकस्त दिला विधानसभा भेजने में कामयाब रही। इस तरह से छोटे-छोटे राजनीतिक दलों को देखा जा रहा है कि ये गठबंधन के जरिए बड़े दलों की सरकार में पहुंचते है और लाभार्थी के रूप में हर पल अपने परिवार का ही चयन करते हैं।इधर हाल के वर्षों में जिस तरह से राजनीति में जातिगत सियासत प्रभावशाली होती जा रही है जातिगत आधार पर गठित राजनीतिक दलों का वर्चस्व भी बढ़ता जा रहा है। सियासत की कुछ ऐसी हिमाकत कह लें कि सत्ता तक पहुंचने के लिए ऐसे जातिगत आधार पर गठित दलों को साथ लेना बड़े दलों की भी मजबूरी होती जा रही है। इस बार के चुनाव में ही सरकार गठन की कवायद के साथ ही बीजेपी के साथ गठबंधन में शामिल अपना दल (एस) और निषाद पार्टी के सुप्रीमो ने सरकार में अपनी नुमाइंदगी के लिए लाबिंग शुरू कर दी है। माना जा रहा है कि निषाद पार्टी की तरफ से पार्टी सुप्रीमो डॉ संजय निषाद स्वयं और अपने पुत्रों तथा अपना दल (एस) की सुप्रीमो सरकार मे अपने पति को शामिल कराने की कवायद कर रही है।

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