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चौरीचौरा कांड के 100 वर्ष : अहिंसा के प्रति गांधी जी का रवैया पूरे देश के लिए स्थायी सबक

By Shakti Prakash Shrivastva on February 5, 2022
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

               बात है 4 फरवरी,1922 की, जब तत्कालीन संयुक्त प्रांत के गोरखपुर जिले के चौरीचौरा क्षेत्र में एक ऐसी घटना घटी जिसने महात्मा गांधी के ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ शुरू किए गए पहले राष्ट्रीय आंदोलन “असहयोग आंदोलन” को स्थगित करा दिया। इस दिन हुआ यूं की एक प्रतिक्रियावादी घटना के चलते असहयोग आंदोलन हिंसा में तब्दील हो गया। चंद ब्रिटिश अधिकारियों के साथ पनपे तनाव के चलते आंदोलनकारियों के एक समूह ने पुलिस थाने को आग के हवाले कर दिया जिसमें 22 पुलिसकर्मी जलकर खाक हो गए। अहिंसा के प्रति अपनी स्पष्ट प्रतिबद्धता रखने वाले महात्मा गांधी जी को यह बहुत नागवार लगा वे इस घटना से इतने व्यथित हुए कि उन्होने एक बड़े व्यापक इस राष्ट्रीय जन आंदोलन के स्थगन की घोषणा कर दी। इस तरह असहयोग आंदोलन अधोगति को प्राप्त हो गया। आंदोलन के कई तत्कालीन शीर्ष नेताओं ने गांधीजी को सुझाव दिया कि महज एक घटना की वजह से हमें एक व्यापक संघर्ष से पीछे नहीं हटना चाहिए। लेकिन गांधी जी को अहिंसा की सफ़ेद पोशाक पर हिंसा के खून के एक भी छींटे बर्दाश्त नहीं थे लिहाजा उन्होने अपने असहयोगी सिद्धान्त पर कायम रहते हुए निर्णय पर कायम रहे और इस तरह असमय असहयोग आंदोलन अपने उद्देश्य प्राप्ति से पहले ही समाप्त हो गया। आज यानि 4 फरवरी, 2022 को चौरीचौरा कांड के सौ साल पूरे होने के मौके पर यह घटना और इसके प्रति महात्मा गांधी का रवैया पूरे देश के लिए एक स्थायी सबक है। सबक है अहिंसा के प्रति गांधी जी के सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता का भी। गांधी जी को इस बात का यकीन था कि हिंसा किसी भी सार्थक आंदोलन को कमजोर ही करती है न कि मजबूत। यही वजह है कि उन्होने ब्रिटिश जैसी ताकतवर मशीनरी के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध की नैतिक शक्ति पर भरोसा किया।

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