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नहीं रहे मुलायम : गाँव और राजनीति के अखाड़े में जीतने वाला हार गया जिंदगी का दांव

By Shakti Prakash Shrivastva on October 10, 2022
0 606 Views

शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव की आवाज में  पूरी रिपोर्ट  सुनने के लिए क्लिक करें।

शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

अपने जिंदगी के आठ दशक से भी अधिक समय तक गाँव से लेकर राजनीति के अखाड़े में हर दांव जीतने वाले समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव आखिरकार जिंदगी की दांव हार गए। बयासी साल की उम्र में गुरुग्राम के मेदान्ता अस्पताल में 22 अगस्त से इलाजरत मुलायम सिंह यादव ने आज सोमवार सुबह लगभग आठ बजे अंतिम सांस ली। समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में तीन बार मुख्यमंत्री और एक बार केंद्र सरकार में मंत्री रहे। पहली बार पांच दिसंबर 1989 से 24 जून 1991 तक, दूसरी बार पांच दिसंबर 1993 से 3 जून 1995 तक और तीसरी बार 29 अगस्त 2003 से 13 मई 2007 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे मुलायम जून 1996 से 19 मार्च 1998 तक भारत के रक्षा मंत्री रहे।

नाम से मुलायम लेकिन निर्णय लेने में कठोर

लोकतन्त्र में पक्ष और विपक्ष दोनों के ही नेताओं द्वारा सम्मान से ‘नेताजी’ कहकर पुकारे जाने वाले नेताजी मुलायम सिंह यादव आज बेशक नही है लेकिन अपने एतिहासिक फैसलों के लिए वो भारतीय राजनीति में युगों-युगों तक याद किए जाएँगे। लोकदल, जनता दल से होते हुए 1992 में समाजवादी विचारधारा वाली समाजवादी पार्टी का गठन करना, 2012 में बहुमत मिलने पर अपेक्षाकृत कम अनुभवी युवा पुत्र अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाना, अयोध्या में रामजन्म भूमि आंदोलन के दौरान कारसेवकों पर गोलियां चलवाने का आदेश देना, 2008 में केंद्र की मनमोहन सरकार में शामिल वामपंथी दलों द्वारा समर्थन वापस लिए जाने की स्थिति में यूपीए को समर्थन दे सरकार बचाना, समाजवादी पार्टी के थिंक टैंक व रिश्ते में भाई प्रो॰रामगोपाल यादव को पार्टी से बाहर निकालना, मण्डल कमीशन का विरोध करने वाले चन्द्रशेखर को समर्थन देना, घोर विरोध के बावजूद अमर सिंह को पार्टी में अहम पद देना फिर बाहर का रास्ता दिखाना, अजीज दोस्त और 27 साल के रिश्ते भूल 2009 में आजम खान का साथ छोड़ना, मुल्ला मुलायम रूप में चर्चित होने के बावजूद हिन्दू सम्राट कल्याण सिंह के साथ 2009 में मंच साझा करना, समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल बेनी प्रसाद वर्मा के पार्टी छोड़ कांग्रेस में जाने और फिर घर वापसी पर 2016 में राज्यसभा भेजना, 1995 से मायावती से दूर-दूर रहने के बाद 24 साल बाद 2019 में मंच पर साथ आना जैसे ये कुछ निर्णय ऐसे हैं जिसके लिए भारतीय राजनीति में मुलायम सिंह हमेशा याद किए जाएँगे।

गाँव के अखाड़े से राजनीति के अखाड़े तक किया सफर

इटावा जिले के सैफई गाँव में एक साधारण किसान परिवार में 22 नवंबर 1939 को जन्में मुलायम अखाड़े में पहलवानी करते-करते 82 वर्षों में राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी बन गए। परिवार में पाँच भाई-बहनों में मुलायम दूसरे नंबर पर थे। कम उम्र में इनकी शादी हो गयी थी लेकिन असमय पत्नी मालती देवी के निधन के बाद इन्होने दूसरी शादी डॉ साधना गुप्त से की। इस शादी का सार्वजनिक खुलासा उन्होने 2006 में किया था। अखिलेश यादव इनके पहली पत्नी के पुत्र हैं जबकि दूसरी पत्नी से प्रतीक यादव पुत्र हैं। आज उनके न रहने पर आम हिन्दुस्तानी की आँखें नम हैं। मात्र 15 वर्ष की उम्र में समाजवादी चिंतक डॉ राम मनोहर लोहिया के आह्वान पर नहर रेट आंदोलन में शामिल हो जेल गए। इटावा, फतेहाबाद और आगरा में शिक्षा-दीक्षा लेने के बाद 1967 में अपने गुरु चौधरी नत्थू सिंह की सीट जसवंत नगर से चुनाव लड़ पहली बार विधानसभा पहुंचे। इसके पहले कुछ दिनों तक अध्यापन कार्य किया लेकिन त्यागपत्र दे राजनीति में आ गए। जीवन में इनकी सबसे बड़ी पहचान पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के मसीहा के रूप में बनी। जो तबका आज भी इनकी पार्टी का वोट बैंक माना जाता हैं। अपने राजनीतिक सफर में मुलायम सिंह पहली बार 1967 में फिर 1974, 1977, 1985, 1989, 1991, 1993 और 1996 में विधायक बने। उपचुनाव में भी 2004 से 2007 तक विधायक रहे। इसके अलावा 1996 में मैनपुरी, 1998 में संभल, 1999 में फिर संभल लोकसभा सीट से सांसद रहे। 2004 में मैनपुरी से चुने गए, लेकिन वहाँ से इस्तीफा दे दिया। फिर 2009 में मैनपुरी, 2014 में आजमगढ़ और 2019 में मैनपुरी से सांसद चुने गए।
समाजवादी पार्टी के गठन से लेकर जनवरी 2017 तक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। इसके बाद अखिलेश यादव ने स्वयं अध्यक्ष बन इन्हें संरक्षक बना दिया।

सबके प्रिय नेताजी

बेहद संजीदा, भावुक, रिश्तों में सौ फीसद ईमानदार मुलायम के व्यवहार के अपने तो अपने पराये भी कायल थे। इसीलिए सभी इन्हें नेताजी कहते थे। इनके व्यक्तित्व को आजम खान के एक शेर से बखूबी समझा जा सकता है। जिसे उन्होने अमर सिंह और कल्याण सिंह की वजह से पार्टी छोड़ने के दौरान मुलायम सिंह के लिए पढ़ा था। शेर है-इस सादगी पर कौन न मर जाए ऐ खुदा, करते हैं कत्ल और हाथ में तलवार नहीं। जीवन में कठोर से कठोर निर्णय लेने भी न हिचकने वाले मुलायम को शत-शत नमन ..

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