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April 4, 2026
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फिर भाई ने छोड़ा साथ !

By Shakti Prakash Shrivastva on January 23, 2026
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                                                      शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव
सियासत ही संभवतः एक ऐसा क्षेत्र है जहां कोई किसी का सगा नहीं होता है। यहाँ सभी रिश्ते मतलब यानि नफा-नुकसान की फार्मूले से तय होते हैं। महाराष्ट्र की सियासत में राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे जैसे भाइयों की सियासत से इसे बखूबी समझा जा सकता है। पिछले दिनों जब महाराष्ट्र में नगर निकायों के चुनावों की घोषणा हुई तो दशकों से एक-दूसरे के धूर विरोधी रहने वाले ठाकरे बंधुओं मतलब राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे दोनों ने ही पुराना गिला-शिकवा भूल एकसाथ आ गए। लेकिन चुनाव बीतने के बाद जब परिणाम आए तो उसके बाद अपने सियासी फायदे के लिए राज ठाकरे ने भाई उद्धव ठाकरे की मंशा के विपरीत ऐसा कृत्य कर दिया है जिसके चलते भाई उद्धव ठाकरे नाराज हो गए है। सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गयी है कि जल्द ही दोनों के बीच रिश्तों की खाई इतनी गहरी हो जाएगी जिसकी भरपाई मुश्किल हो।
हुआ ये कि चुनाव से पहले अधिकांश निकायों पर अपनी दावेदारी को देखते हुए दोनों भाइयों को लगा कि साथ आने से न केवल उनका प्रभाव बढ़ेगा बल्कि कुछ निकायों पर उसका कब्जा भी हो जाएगा। लेकिन कल्याण-डोंबिवली नगर निगम में राज ठाकरे ने अपने ही भाई उद्धव ठाकरे को धोखा दिया है। राज ने वहाँ शिवसेना को नुकसान पहुंचाने वाले एकनाथ शिंदे को अपना समर्थन दे दिया है।
राज ठाकरे का यह फैसला उद्धव ठाकरे के लिए बड़ा झटका है। क्योंकि राज और उद्धव ने हाल ही में एक साथ मिलकर महायुति के खिलाफ साथ चुनाव लड़ा था। इस फैसले से उद्धव ठाकरे राज से खासा नाराज हैं। उद्धव ने बीते दिन बुधवार को कॉरपोरेटर्स के साथ हुई बैठक में अपनी नाराजगी जताई।
दरअसल चुनावी नतीजों की मुताबिक कल्याण-डोंबिवली नगर निगम में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है। यहां कुल 122 सीटों में बहुमत के लिए 62 चाहिए। एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना ने सबसे ज्यादा 53 सीटें जीतीं। बीजेपी को 50 मिलीं. मनसे को 5, उद्धव गुट को 11 और शरद पवार गुट की एनसीपी को 1 सीट मिली।
चुनाव से पहले शिवसेना उद्धव गुट के सर्वेसर्वा उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे ने अपने बीच की पुरानी गीले-शिकवे दूर करते हुए एकसाथ आ गए थे। उन्हे भरोसा था कि ऐसे में बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना को मुंह की खानी पड़ेगी। लेकिन परिणाम आने पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
ऐसे में बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए एकनाथ शिंदे ने मनसे पार्षदों पर डोरे डाले। इससे राज ठाकरे की मनसे ने भी शिंदे सेना की मंशानुरूप समर्थन का ऐलान कर दिया। एकनाथ शिंदे के साथ मनसे के आने से एकनाथ शिंदे गुट का आंकड़ा 53 से बढ़कर 58 हो गया। साथ ही शरद पवार NCP के 1 पार्षद ने भी समर्थन दिया वहीं उद्धव गुट के 11 में से 4 कॉर्पोरेटर ‘अनरिचेबल’ हैं, यानी संपर्क में नहीं है। अगर वे शिंदे की तरफ जाते हैं, तो शिंदे गुट बहुमत पार कर सकता है। इसका मतलब है कि बीजेपी यहां सत्ता से बाहर रहेगी। लेकिन एकनाथ शिंदे की शिवसेना को तो फायदा होगा लेकिन राज और उद्धव के अलग होने की स्थिति में पूरे प्रदेश की सियासत में असली फायदा बीजेपी को ही होगा।

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