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विपक्षी गठबंधन के तार-तार होने के आसार

By Shakti Prakash Shrivastva on February 26, 2025
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                                                                         शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

किसी लोकतान्त्रिक देश में सत्ता पक्ष का जितना महत्व होता है उतना ही महत्व विपक्ष का भी होता है। यही वजह है कि स्वस्थ लोकतंत्र में सफल सरकार के लिए मजबूत विपक्ष की भी  आवश्यकता होती है। लेकिन देश की मौजूदा लोकतान्त्रिक व्यवस्था में इसकी कमी नजर आ रही है। क्योंकि एकतरफ सत्तारूढ़ बीजेपी की लोकप्रियता का आलम ये है कि उसके सामने एक समय ऐसा भी आया कि विपक्ष के नेता के लिए दल के पास जो न्यूनतम लोकसभा सदस्य संख्या होनी चाहिए उतने भी सदस्य विपक्ष के पास नहीं थे। हालांकि बीते लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों ने आपसी सहमति से आईएनडीआईए यानि इंडियन नेशनल डेवेलपमेंटल इंकलूसिव अलायंस नाम से गठबंधन बनाया जिसकी बदौलत लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने की काबिलियत हासिल की। इस गठबंधन का मूल उद्देश्य बीजेपी को सत्ता से बाहर करना था। काफी हद तक इस गठबंधन का प्रभाव आम चुनावों में दिखा भी। इससे जहां राष्ट्रीय स्तर पर मुख्य विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस को संजीवनी मिली। वहीं राज्य स्तर पर भी गठबंधन की साझेदार क्षेत्रीय दलों को मजबूती मिलती दिखी। अलग-अलग राज्यों में विपक्षी गठबंधन के सहयोगी क्षेत्रीय दलों ने बीजेपी के बढ़ते रसूख को नियंत्रित करने में सफलता पाई। इसका असर ये रहा कि जो बीजेपी अपने गठबंधन के साथियों के बगैर सहयोग के अकेले दम पर लगातार दो बार केंद्र में बहुमत की सरकार बनाने में सफल रही उसे तीसरी बार सरकार बनाने के लिए अपने सहयोगी दलों के समर्थन की जरूरत पड गई। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता खासकर बीते लोकसभा चुनाव के बाद हुए राज्यों के विधानसभा चुनावों के आते-आते गठबंधन की गांठों में दरार पडनी शुरू हो गई। दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम आते-आते यह साबित हो गया कि विपक्षी गठबंधन में पड रही दरार अब गहरी खाई का रूप ले चुकी है।

विपक्षी दलों ने लोकसभा चुनाव के मद्देनजर मिलकर बीजेपी मुक्ति का जो नारा दिया था। उसका असर दिखा भी लेकिन बाद के विधानसभा चुनावों में उनकी एकता तार-तार होते नजर आने लगी। हरियाणा चुनाव, महाराष्ट्र चुनाव और दिल्ली विधानसभा चुनाव आते-आते यह पुख्ता हो गया। दिल्ली में तो बाकायदा बीजेपी के खिलाफ गठबंधन के ही दो प्रमुख दल आमने-सामने हो गए थे। दिल्ली में लगातार दो बार से सरकार में काबिज आम आदमी पार्टी के सामने विपक्षी गठबंधन के सबसे मजबूत घटक दल कांग्रेस चुनाव मैदान में उतर गई। अंततः जैसा होना था हुआ जो परिणाम आम आदमी पार्टी के पक्ष में होना था वो बीजेपी के पक्ष में चला गया। बीजेपी सत्ताईस वर्षों के बनवास के बाद पुनः सत्ता में काबिज हो गई। इस दौरान आम आदमी पार्टी और काँग्रेस के बीच में जो दूरियाँ बन गई है वो निकट भविष्य में कितना नजदीकियों में बदल पाएगी कहना मुश्किल है। क्योंकि दिल्ली में कांग्रेस को छोड़ जिस तरह समाजवादी पार्टी, शिवसेना उद्धव, तृणमूल काँग्रेस आदि ने आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया उससे स्थितियाँ साफ हो गई है कि अब आने वाले दिनों में गठबंधन का असर कही देखने को नहीं मिलेगा।

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