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यूं ही कोई मेहरबा नहीं होता..

By Shakti Prakash Shrivastva on July 21, 2023
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

                          कहते हैं कि राजनीति का कोई अपना दीन ईमान नहीं होता है। क्योंकि इसमें किसी विचारधारा का समर्थक दूसरे विचारधारा के समर्थकों को कोसता है। लेकिन पलक झपकते वही नेता उसकी तारीफ भी करने लग जाता है। इसका मतलब कि राजनीति का दीन ईमान सिर्फ उसका वर्तमान और भविष्य में होने वाला फायदा है। ऐसा और भी क्षेत्रों में है लेकिन राजनीति में ज्यादा देखा जाता है। इसे अगर उत्तर प्रदेश के संदर्भ में देखें तो महज लगभग एक वर्ष पूर्व जो नेता बीजेपी छोड़कर सपा के साथ चले गए थे। अगर अब लोकसभा चुनाव के पहले वापस बीजेपी में लौट आए है तो फिर किसी को इन नेताओं के जाने और आने पर आश्चर्य नही होना चाहिए। क्योंकि निश्चित है कि जब गए तो उन्हे वहाँ भविष्य बेहतर दिख रहा था लेकिन फिर बेहतर भविष्य की तलाश में वापस चले आए। जिस किसी ने उन्हे अपने यहाँ वापस आने का मौका दिया उसके लिए भी यही फार्मूला मौजू है कि उसे उनके आने से फायदा हैं। इसलिए आने का मौका दिया। क्योंकि राजनीति में यूं ही कोई मेहरबा नहीं होता..

सियासत के जानकारों के हवाले से इसे विस्तार से ऐसे समझा जा सकता है कि बीजेपी ने इस ओबीसी कार्ड को महज इसलिए खेला है या अहमियत दी है कि इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क्षेत्र वाराणसी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का क्षेत्र गोरखपुर को सुरक्षित किया जा सके। क्योंकि इस इलाके में इस वर्ग विशेष का समीकरण प्रभाव रखता है। प्रदेश की सभी अस्सी लोकसभा सीटें जीतने का दावा करने वाली बीजेपी ओमप्रकाश राजभर और दारा सिंह चौहान के जरिए पूर्वाञ्चल के सत्ताईस लोकसभा सीटों पर इनका इस्तेमाल कर इनके वोटर्स को अपनी तरफ आकर्षित करना चाहती है। इसका बेहतर संदेश देने के लिए ही बीजेपी के प्रदेश मुखिया भूपेंद्र चौधरी अचानक बुधवार को राजभर के यहाँ चाय पीने पहुँच गए। सपा से गठबंधन कर जब राजभर पिछला विधानसभा चुनाव लड़े तो उनके 6 विधायक चुने गए थे। विधानसभा चुनाव में बीजेपी इस वर्ग विशेष का प्रभाव इन इलाकों में देख चुकी है। वाराणसी क्षेत्र में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के गठबंधन की वजह से पार्टी को कई सीटें गँवानी पड़ी थी। पार्टी इस बार वो गलती दुहराना नहीं चाहती है। वाराणसी के सटे जिलों में पिछड़ा और अति पिछड़ों का लगभग 7 से 8 प्रतिशत तक वोट माना जाता है। आंकड़ों की मुताबिक पिछड़े वर्ग का प्रभाव पूर्वांचल में पूरे प्रदेश का 42% से ज्यादा है।

हालांकि पिछले एक दशक में बीजेपी की तरफ ओबीसी मतदाताओं का झुकाव तेजी से बढ़ा है। 2014 में बीजेपी को जहां 34 % ओबीसी वोट मिले वहीं 2019 में 44 % ओबीसी ने बीजेपी को वोट दिया। इस आंकड़ों के परिप्रेक्ष्य में अगर सीटों की बात करें तो 2022 विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने 315 सीटें हासिल की थी तो वहीं 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 65 सीटें हासिल की थी। यह बदलाव 2014 के बाद से आया है। चुनाव यूपी का हो या केंद्र का पिछड़े वर्ग का वोट बीजेपी के पास एकमुश्त आने लगा। जबकि पहले यही मतदाता क्षेत्रीय दलों के साथ हुआ करते थे। फिलहाल उत्तर प्रदेश की सियासत एक बार फिर OBC समुदाय के इर्द-गिर्द घूमती दिख रही है। सूबे की सभी पार्टियां ओबीसी को केंद्र में रखते हुए अपनी राजनीति एजेंडा सेट कर रही हैं। यूपी में सबसे बड़ा वोट बैंक पिछड़ा वर्ग का है। सूबे में 52% पिछड़े वर्ग की आबादी है। इसमें 43 % गैर-यादव यानि जातियों को अतिपिछड़े वर्ग के तौर पर माना जाता है। OBC की 79 जातियां हैं, जिनमें सबसे ज्यादा यादव और दूसरे नंबर कुर्मी समुदाय की है। बीजेपी को 2019 के लोकसभा चुनाव में पूर्वांचल की अंबेडकरनगर, आजमगढ़, घोसी, गाजीपुर, लालगंज और जौनपुर सीट पर हार का मुंह देखना पड़ा था। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी सपा के साथ राजभर और अपना दल कैमुरावादी का गठबंधन होने से इलाके में बीजेपी को बड़ा नुकसान हुआ था। इलाके में खासकर पीएम और सीएम के क्षेत्र के लिए बीजेपी कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती है लिहाजा उसने 2024 की लोकसभा चुनाव के पहले इलाकाई समीकरणों को चुस्त-दुरुस्त करना शुरू कर दिया है।

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