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नागपंचमी विशेष : सर्पकुंड की मिट्टी से भागते हैं सांप

By Shakti Prakash Shrivastva on August 2, 2022
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पूर्वाञ्चलनामा रिपोर्ट, लखीमपुर खीरी। लखीमपुर जिले के देवकली नामक स्थान के बारे में मान्यता है कि यहाँ स्थित सर्पकुंड की मिट्टी जहां रख दें वहाँ से सांप दूर भागते हैं। नगर मुख्यालय से लगभग दस किलोमीटर पश्चिम दिशा में देवकली नामक स्थान है। इस स्थान का पौराणिक महत्व है। इसे महाभारत कालीन राजा जन्मेजय के नागयज्ञ स्थली भी मानते हैं। यहाँ के बारे में एक और मान्यता है कि राजा जन्मेजय ने अपने पिता राजा परीक्षित की तक्षक नाग के डसने से हुई मौत का बदला लेने के लिए यहीं पर सर्प यज्ञ का भव्य आयोजन किया था। यहां पर सर्पकुंड आज भी मौजूद है। देवस्थली के रूप में पारासर पुराण के तीर्थ महात्म्य में भी इसका उल्लेख मिलता है। महाभारत कालीन कई पुराणों और ग्रंथों में नाग यज्ञ का संदर्भ मिलता है। यहाँ के बारे में कहा जाता है कि नेपाल के एक संत भवानी प्रसाद उपाध्याय उर्फ नेपाली बाबा यहाँ आए। उन्होंने ही सर्पकुंड की खुदाई कराई थी। खुदाई में लगभग पांच फिट की गहराई के बाद राख मिश्रित काली मिट्टी मिली थी। इसके बाद नेपाली बाबा ने यहाँ चन्द्रकला आश्रम की स्थापना की। बाबा तो अब नही है लेकिन उनके द्वारा स्थापित आश्रम, द्वादश ज्योर्तिलिंग और अन्य देवमूर्तियां आज भी मौजूद हैं। इस स्थान से कुछ दूरी पर ऊंचे-ऊंचे टीले है जिसमें सैकड़ों की संख्या में बाँबियां हैं। इन बाँबियों में बड़ी संख्या में भिन्न-भिन्न प्रजातियों के सांप रहते हैं। लेकिन इलाकाई बताते है कि सर्पकुंड के पास काभी सांप नही देखे गए। नागपंचमी के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु सांपों से छुटकारा के लिए सर्पकुंड की मिट्टी अपने घरों के लिए लेकर जाते हैं। आज यह जगह नागपूजा और काल सर्प योग निवारण के लिए तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र बन गया है। इस स्थान के बारे में एक और मान्यता है कि कलयुग के प्रारंभ में यहाँ देवक नाम के एक राजा हुए थे। जिनकी पुत्री का नाम देवकली था। उसने भी यहाँ तपस्या की थी लिहाजा मान्यता है कि उसी के नाम पर यहाँ का नाम देवकली पड़ा। राजा देवक द्वारा बनवाया गया देवेश्वर शिव मंदिर आज भी मौजूद है। मंदिर परिसर में ही एक खंडित शिवलिंग है जिसके बारे में कहा जाता है कि मुगलों ने इसे पूरी तौर से नष्ट करने की कोशिश की लेकिन वह इसे सिर्फ खंडित ही कर पाए समाप्त नही कर पाए। इस इलाके की खुदाई में प्राप्त सिक्के-मूर्तियों आदि के आधार पर यहाँ गुप्तकालीन समृद्ध और विकसित बस्ती होने का प्रमाण मिलता है। नागपंचमी के दिन देवकली में सपेरों का बड़ा मेला लगता है। इसमें बड़ी संख्या में कालसर्प दोष निवारण पूजन के लिए श्रद्धालु यहाँ आते हैं।


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