August 16, 2022
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‘यादवों’ के हाथों से निकलता यादव वोट बैंक

By Shakti Prakash Shrivastva on July 26, 2022
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

देश की राजनीति में यादव वोट बैंक की नुमाइंदगी की बात करे तो दो यादव कुनबे का नाम सर्वोपरि आता है। एक नाम मुलायम सिंह यादव और दूसरा नाम लालू प्रसाद यादव कुनबे का। मुलायम सिंह का जहां उत्तर प्रदेश की राजनीति में अहम दखल है वहीं लालू प्रसाद यादव का बिहार में। इन दोनों ही नेताओं ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए अपने यादव कुल का नितांत निजी प्रापर्टी के तौर पर बखूबी इस्तेमाल किया। मुलायम सिंह यादव ने उसे अपने द्वारा बनाई गई समाजवादी पार्टी और लालू प्रसाद यादव ने अपने राष्ट्रीय जनता दल के लिए वोट बैंक समझा। लेकिन जिस तरह से कानपुर में बीते दिनों मुलायम सिंह के अति करीबी लोगों मे शुमार रहे चौधरी हरमोहन सिंह यादव की दसवीं पुण्यतिथि के मौके पर आयोजित भव्य समारोह को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्चुअली संबोधित किया है। उससे इन दोनों यदुकुल के ठेकेदार राजनीतिज्ञों के रातों की नींद उड़ गयी है। राजनीति के जानकारों की मानें तो नरेंद्र मोदी ने ऐसा कर मुलायम और लालू के यादवी विरासत में बखूबी सेंध लगा दी है। इस कार्यक्रम का आयोजन चौधरी हरमोहन सिंह यादव के सुपुत्र और विधानपरिषद के पूर्व सभापति चौधरी सुखराम सिंह यादव और उनके बेटे चौधरी मोहित यादव के संयोजन में हुआ। इस आयोजन के संचालक और श्रीकृष्ण धर्म ट्रस्ट के माध्यम से देशभर में यदुकुल स्वाभिमान जागरण की अलख जगाने वाले कालीशंकर की माने तो आयोजन में देश के अठारह राज्यों के कई हजार यादव वंशजों ने न केवल शिरकत की बल्कि यदुकुल स्वाभिमान और प्रोत्साहन के लिए हरसंभव प्रयास करने का संकल्प भी लिया। कालीशंकर का मानना है कि अब यदुवंशी जाग गया है। अब उसे अपने हक और हकूक की चिंता होने लगी है। उसने यह तय कर लिया है कि वो अब हर उस राजनीतिक दल के साथ है जो यदुकुल हितार्थ होगा। चाहे वो बीजेपी ही क्यों न हो। अब वो किसी राजनीतिक दल के हाथ की कठपुतली बन कर नही रहेगा। इस तरह से जानकारों में जो संशय मुलायम-लालू को लेकर है वो जायज लग रहा है। क्योंकि लालू के कुनबे के अलंबरदार उतने समझदार नही है वहीं मुलायम के यहाँ शिक्षित तो अखिलेश है लेकिन उनमें परिपक्वता का अभाव उन्हे कही का नही छोड़ेगी। इसका फायदा मोहित जैसों को मिलता दिख रहा है। मोहित में लालू के सुपुत्रों वाली कमियाँ नही है और न अखिलेश यादव वाली। इसलिए सभी की निगाहे अब सियासत के नए यादवी ध्रुव मोहित यादव पर टिकी हुई है। इनकी क्षमता को जानने वालों का मानना है कि यादवों की थाती अब इन्ही को मिलेगी। यदुवशियों का भी इनपर भरोसा बढ़ते हुए दिख रहा है। इस तरह अगर यह किन्तु-परंतु की स्थिति यूं ही बनी रहे तो वो दिन दूर नही जब यादव पूरी तरह बीजेपी के साथ खड़ा नजर आएगा। यदि ऐसा हुआ तो उत्तर प्रदेश मे मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू यादव का यादवों पर एकाधिकार क्षीण होता जाएगा। यानि अब यादव ही यादवी नेताओं की सरपरस्ती स्वीकारने को तैयार नही होगा।


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