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राष्ट्रपति बनीं मुर्मू ! बीजेपी के ‘मिशन 2024’ के लिए बिछा दीं रेड कार्पेट

By Shakti Prakash Shrivastva on July 21, 2022
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

राष्ट्रपति चुनाव में अपने प्रतिद्वंदी और विपक्ष के साझा उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को अच्छे-खासे अंतर से पीछे छोड़ द्रौपदी मुर्मू देश की प्रथम नागरिक बन गईं हैं। इस आशय का महज औपचारिक घोषणा शेष है। सही मायने में बीजेपी की अगुवाई में एनडीए गठबंधन को मिले इस जीत ने बीजेपी के मिशन 2024 के लिए रेड कार्पेट बिछाने का काम किया है। राजनीति के जानकारों की माने तो लोकसभा चुनाव के ठीक पहले होने वाला राष्ट्रपति पद का यह चुनाव, सत्ता पक्ष और विपक्ष के लिए अपनी ताकत व एकता दिखाने का एक अवसर था। पक्ष से अधिक विपक्ष के लिए यह एक अहम था लेकिन इस अवसर को अपने पक्ष में करने में विपक्ष पूरी तरह से नाकाम रहा। इसका भरपूर फायदा बीजेपी ने उठाया और आगे 2024 चुनाव में भी उसे इसका लाभ मिलेगा। इस चुनाव में जिस तरह के परिणाम देखने को मिला उससे विपक्षी एकता संबंधी प्रयास महज कोरा भ्रम साबित हुआ। स्पष्ट हो गया कि देश की अधिकांश विपक्षी पार्टियां कांग्रेस की अगुवाई में चलने को तैयार नही है वहीं कांग्रेस किसी दूसरे पार्टी के नेतृत्व में आगे बढ़ने को राजी नही है। कुल मिलाकर पूरी चुनावी प्रक्रिया के दौरान विपक्ष अलग-अलग बिखरा नजर आया। विपक्ष के इस बिखराव का बीजेपी ने जमकर राजनीतिक फायदा लिया। जिन विपक्षी दलों ने विपक्ष के साझा उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को समर्थन देने की घोषणा की थी। उन्ही में से कई ने दलीय प्रतिबद्धता छोड़ मुर्मू के पक्ष में वोट डाला। जनता दल (सेक्युलर), झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) व शिवसेना उद्धव ग्रुप ने खुलेआम मुर्मू के समर्थन में खड़े दिखे। आदिवासी समुदाय की महिला द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी विपक्षी एकता को खंडित करने में सोने में सुहागा साबित हुआ। क्योंकि आदिवासी समुदाय से आने वाली देश की पहली दलित महिला राष्ट्रपति की राह में रोड़ा बनने का साहस किसी विपक्षी ने नही किया। लिहाजा बीजेपी का यह चक्रव्यूह विपक्ष समझ नहीं पाया और धराशायी हो गया। पूर्व राष्ट्रपतियों में दलित समुदाय से आने वाले के आर नारायणन हों या पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल इन दोनों के ही समय में देश में कांग्रेस का शासन था। वो ऐसा समय था, जब कांग्रेस दूसरे दलों को भरोसे में लेकर चलती थी और दूसरे दलों को भी कांग्रेस पर विश्वास था। लेकिन अब समय बदल गया है। आज कांग्रेस पार्टी चाहती है कि विपक्ष उस पर वैसा ही भरोसा करे, जैसा पहले करता था। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा क्योंकि अब वैसे नेता नहीं है और कांग्रेस पार्टी में ही एकता नहीं है। पार्टी में कौन सुप्रीम है, कार्यकर्ता यही पता लगाने में जुटे रहते हैं। पार्टी के भीतर अलग विचारधारा वाले नेताओं का समूह बन गया है। ऐसे में कोई दल, भला कांग्रेस का नेतृत्व क्यों स्वीकार करे। टुकड़े-टुकड़े में बंटे विपक्ष की स्थिति ये है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी आम आदमी पार्टी को कांग्रेस का विकल्प मानने लगे हैं, ऐसे में वे राहुल के पीछे क्यों चलेंगे। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में अपने दम पर बीजेपी को हराया है। इसलिए वो भी कांग्रेस को नही स्वीकारती। क्षेत्रीय पार्टियों की अपनी परेशानियाँ हैं वो लोकसभा में तो एक होने की सोच सकते हैं, लेकिन विधानसभा में वे एक हो ही नहीं सकते। यही बात उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट होने से रोकती है। गुरुवार को ममता बनर्जी कि तृणमूल कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया कि वह उपराष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा नहीं लेगी। वजह, विपक्ष ने मार्गरेट अल्वा को उम्मीदवार घोषित करते वक्त उससे सलाह नहीं ली। विपक्ष के इसी विखराव वादी सोच का बीजेपी हर मौके पर फायदा उठा रही है। इस संदर्भ में बीजेपी ने जो रणनीति बनाई है, उसमें राष्ट्रपति के बाद अब उपराष्ट्रपति चुनाव में भी एनडीए उम्मीदवार भारी मतों से जीत दर्ज करेंगे इसमें कोई शक नहीं है।

 

 


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