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यूपी उप चुनाव : ‘आजम’ के ‘गढ़’ और आजमगढ़ दोनों में हुई साइकिल पंचर, खिला कमल

By Shakti Prakash Shrivastva on June 26, 2022
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

उत्तर प्रदेश में मुलायम कुनबा से प्रभावित क्षेत्रों को छोड़ दें तो आजम खान की वजह से रामपुर और मुलायम-अखिलेश प्रभाव की वजह वाली आजमगढ़, ये दो ही ऐसी लोकसभा सीटें थी जहाँ आज भी समाजवादी पार्टी का खासा प्रभाव है। पिछले विधानसभा चुनाव में तो आजमगढ़ में बीजेपी का खाता तक नही खुल सका था। सभी दसों सीटों पर समाजवादी पार्टी ने कब्जा कर लिया था। लेकिन मार्च से जून आते-आते ऐसा क्या हो गया कि इन दोनों ही महत्वपूर्ण सीटों पर न केवल सपा की साइकिल पंचर हो गई यानि सफाया हो गया बल्कि अरसे से जोर आजमाइश कर रही बीजेपी अपना कमल खिलाने में सफल हो गई। रामपुर में जहां आजम खान के कभी खासमखास रहे लेकिन विधानसभा चुनाव के पहले बगावती हो गए घनश्याम लोधी ने सपा के और आजम के खासमखास आसिम रजा को पटखनी देते हुए विजय पताका लहराई वहीं आजमगढ़ में पिछले लोकसभा चुनाव के रनर अप रहे बीजेपी प्रत्याशी और भोजपुरिया स्टार दिनेश लाल यादव निरहुआ ने सपा सुप्रीमो के भाई धर्मेन्द्र यादव को पराजित कर विजय श्री हासिल की। चुनाव आयोग की मुताबिक आजमगढ़ में बीजेपी प्रत्याशी निरहुआ को 312768 वोट, सपा के धर्मेन्द्र यादव को 304089 और बीएसपी के गुड्डू जमाली को 266210 वोट मिले। रामपुर और आजमगढ़ लोकसभा सीट के इस उपचुनाव में हुए परिणामी उलटफेर ने सपा को आत्ममंथन करने को बाध्य कर दिया है। अगर अब भी अखिलेश यादव ने अपना ढर्रागत रवैय्या नहीं बदला तो प्रदेश में उनकी राजनीति का टा-टा, बाय-बाय होना तय है। हालंकी उपचुनाव में हुई यह जीत बीजेपी के लिए काफी मायने रखती है, क्योंकि रामपुर को सपा के कद्दावर नेता आजम खां और आजमगढ़ को अखिलेश-मुलायम का गढ़ माना जाता है। 2019 लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ से अखिलेश यादव जीते थे। वहीं, 2014 में मुलायम सिंह यादव यहां से सांसद चुने गए थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में आजम खां रामपुर में सांसद बने थे। अखिलेश यादव ने बाद में आजमगढ़ की संसदीय सीट छोड़ दी थी और विधानसभा सीट पर काबिज हो गए थे। इसीलिए यहाँ उपचुनाव भी हुआ। पूरे चुनाव में एक चीज अलग दिखी कि जहा योगी आदित्यनाथ समेत बीजेपी के कद्दावर नेता प्रचार में आए वही सपा मुखिया अखिलेश ने एक भी सभा नही की। आजमगढ़ के मतदाताओं को शायद यह बात नागवार लगी जिसका परिणाम आज सामने है। रामपुर की बात करे तो वहाँ बीजेपी उम्मीदवार घनश्याम लोधी पहले आजम खां के करीबी थे। सपा से एमएलसी भी रह चुके हैं। 2022 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले लोधी ने सपा का दामन छोड़कर भाजपा जॉइन कर ली थी। तब वह पार्टी से टिकट पाने की कोशिश में लगे थे, लेकिन नहीं मिल पाया। आजम खां के लोकसभा सीट छोड़ने पर उपचुनाव का एलान हुआ तो भाजपा ने घनश्याम लोधी को उम्मीदवार बना दिया। दूसरी तरफ सपा ने आजम खां के करीबी आसिम रजा को टिकट दिया। जेल से बाहर आने के बाद खुद आजम खां ने ही आसिम के नाम का एलान किया था, लेकिन घनश्याम लोधी ने 42 हजार मतों से जीत हासिल की। इन दोनों ही सीटों पर मिली सपा की करारी पराजय के पीछे सबसे अहम लगता है सपा सुप्रीमो का चुनाव में अपने को अलग रखना और जातीय समीकरणों का गड़बड़ाना। जैसे आजमगढ़ लोकसभा सीट के तहत आने वाली मेंहनगर, आजमगढ़ सदर, मुबारकपुर, सगड़ी और गोपालपुर विधानसभा सीटों पर यादव और मुस्लिम वोटर्स का बोलबाला है। दलित और कुर्मी वोटर्स भी निर्णायक भूमिका में रहते हैं। आमतौर पर यादव वोटर्स सपा के साथ जाते हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी स्थानीय स्तर पर निरहुआ का जनता के बीच में बने रहना और अखिलेश यादव का दूर रहना। इससे सपा के कोर वोटर्स भी भाजपा में शिफ्ट हो गए। वहीं, मुस्लिम वोट शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली और सपा के धर्मेंद्र यादव में बंट गए। आजम के गढ़ रामपुर की बात करें तो वहाँ सबसे ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं। इसके बाद लोधी, सैनी और दलित मतदाताओं की संख्या भी काफी है। सूत्रों की मुताबिक घनश्याम लोधी की इन जातियों पर खासी पकड़ हैं। इसके ओबीसी और सामान्य वर्ग ने भी भाजपा का साथ दिया। बसपा और कांग्रेस के मैदान में न होने का लाभ भी भाजपा को मिला हिंदुओं का वोट भी एकजुट हो गया। कांग्रेस नेता और 2019 लोकसभा में कांग्रेस के प्रत्याशी रहे नवाब काजिम अली खान के भाजपा समर्थन का लाभ भी मिला। इसके अलावा पिछले दिनों सुर्खियों में रहे आजम-अखिलेश मतभेद का भी चुनाव में असर दिखा। आजम के मामले में अखिलेश के रवैये से नाराज मुस्लिमों ने आजमगढ़ में बड़ी तादाद में बसपा के शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली पर भरोसा जताया। इसके चलते मुस्लिम वोट बंट गए। वहीं, निरहुआ पर यादव के साथ-साथ दलित और कुर्मी वोटर्स ने भी विश्वास जताया। दोनों ही जगहों पर पिछले चुनाव की तुलना में वोटिंग परसेंटेज का कम होना भी परिणाम प्रभावित किया। और इन सभी कारणों से इतर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आक्रामक और अनुशासित कार्यशैली का मतदाताओं पर खासा प्रभाव दिखा। रामपुर में बुलडोजर की क्रियाशीलता और आजमगढ़ में अपराधियों के खिलाफ पुलिसिया सख्ती का भी मतदाताओं पर सकारात्मक असर पड़ा। इसके अलावा मुफ्त राशन, पीएम आवास योजना जैसी नीतियां भी भाजपा के लिए कारगर साबित हुईं। कुल मिलाकर लबबों-लुआब ये है कि सपा के दो मजबूत किले इस उपचुनाव में ढह गए। इसका 2024 आम चुनाव में बीजेपी के पक्ष में निश्चित ही सकारात्मक संदेश जाएगा।


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