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जन औषधि केंद्र: ...ताकि मिलें सस्ती दवाएं

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: जन औषधि केंद्र खोल कर लोगों को 70 गुना तक कम दाम में दवाएं मुहैया कराना एक नेक काम है. जब सरकार हर महीने की आमदनी की गारंटी लेने के साथ आर्थिक सहायता देने के लिये भी तैयार है तो क्यों न इस मौके का लाभ उठाएं 
सरकार चाहती है कि लोगों को सस्ती चिकित्सा उपलब्ध हो. इसके लिये उसने चिकित्सकों से कहा है कि वे जेनरिक दवाइयां लिखें. ये दवाइयां अपने समकक्ष ब्रांडेड दवाइयों के मुकाबले कई बार तो 70 से 80 गुना तक सस्ती होती हैं उदाहरण के लिए एलर्जी या जुकाम की एक सामान्य दवा सिट्रिजिन बाजार में 6 रुपए की एक गोली मिलती हैं, जबकि वही जेनेरिक स्वरूप में ये महज 20 पैसे में उपलब्ध है। मुसीबत यह है कि इन्हें डॉक्टर लिखते नहीं, सो बाजार में भी कम ही उपलब्ध हैं. निजी दवा कंपनियों के मनमर्जी के दाम वसूलने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने और सभी को सस्ती दवा सुलभ कराने के लिये देश में 3,000 जन औषधालय खोलने का लक्ष्य है जहां ये जेनेरिक दवाएं ही नहीं मेडिकल उपकरण भी सस्ते एमं बेचे जायेंगे. जन औषधि केंद्रों पर ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारियों, डायबिटीज और एंटीबायटिक दवाएं 17 गुना तक सस्ती मिलेंगी। हार्ट की बीमारी की जो दवा 140 रुपये में मिलती है, वह केवल नौ रुपये में मिल सकेगी.
सूबे की सरकार सुनिश्चित करने वाली है कि जन औषधि केंद्रों वे सभी जरूरी दवाएं हों जो केंद्र की सूची में होती हैं. यह भी कि चिकित्सकों द्वारा इनका लिखना अनिवार्य हो. सरकार की योजना है कि कुछ महीनों के भीतर ही बड़े-बड़े मॉल में भी सस्ती जेनरिक दवाएं मिलने लगें. पूर्वांचल में रेलवे स्टेशन, बस अड्डों जैसी जगहों के अलावा भी गांव कस्बों में करीब 50 जगहों पर ये केंद्र खोले जाने हैं. जन औषधि केंद्र खोल कर सरकार की इस मुहिम में आप भी सहभागी बन सकते हैं. यह काम सिर्फ परोपकार का ही नहीं फायदे का भी है. 

ऐसे खोलें जन औषधि केंद्र 
तीन तरह के जन औषधि केंद्र खोले जा सकते हैं। पहला,कोई भी व्यक्ति, दूसरा बेरोजगार फार्मासिस्ट, डॉक्टर, रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर और तीसेरे ट्रस्ट, एनजीओ, प्राइवेट हॉस्पिटल, सोसायटी और स्व्यं सहायता समूह जन औषधि खोलने के पात्र हैं बशर्ते उसे समाज सेवा के क्षेत्र में कम से कम 3 साल का अनुभव हो। अगर आपके पास तकरीबन चार से पांच लाख की पूंजी और 120 वर्गफीट जमीन स्टोर खोलने और इतनी ही जगह भंडारण के लिये है, साथ ही बाकी पात्रताएं भी, तो आप इस योजना को लागू करने वाले डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्‍युटिकल्‍स, ब्‍यूरो ऑफ फार्मा पब्लिक सेक्‍टर अंडरटेकिंग ऑफ इंडिया (बीपीपीआई) के पास अपना आवेदन भेजें. तरीका यह है - 
http://janaushadhi.gov.in/data/GuidlinesJAS.pdf पर जायें और यहां से इसका आवेदन पत्र डाउनलोड कर लें. पूरी तरह से भरे अपने प्रार्थना पत्र को 2000 रुपए के डिमांड ड्राफ्ट के साथ इस  दिए गए पते नीचे दिए पते पर भेज सकते हैं.  
जनरल मैनेजर (ए एंड एफ) ब्यूरो ऑफ फार्मा पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग ऑफ इंडिया आईडीपीएल (कॉरपोरेट ऑफिस) आईडीपीएल कॉम्प्लेक्स पुरानी दिल्ली, गुडग़ांव रोड दुनदहेड़ा हरियाणा-122016
अच्छी आमदनी के लिये स्टोर वहां खोलें जहां ज्यादा दवा बिके. केंद्र की स्वीकृति मिल जाने पर जेनरिक दवाओं का पूरा स्टॉक सरकार द्वारा मुहैया कराया जाता है. तकरीबन 600 दवाएं और 155 मेडिकल उपकरण इसमें शामिल हैं. आपको अपने स्टोर में एक कंप्यूटर, एक बिल प्रिंटर, इंटरनेट कनेक्शन और रेफ्रिजरेटर जैसे जरूरी सामान रखने होंगे, जन औषधि केंद्र आरंभ करने के लिए सरकार ढाई लाख रुपए तक की वित्‍तीय सहायता दे रही है. दवाओं के खरीदारी के लिए पूंजी प्रवाह बना रहे इसलिये अतिरिक्त पूंजी हमेशा बनी रहनी चाहिये. शुरू में एक साल तक 10,000 रूपये सरकार हर महीने बंधी रकम देगी, साथ ही साल भर में बेची गयी दवाओं की लागत पर 10 फीसद की प्रोत्साहन राशि भी.

ध्यान रहे 
1 सरकार के लगातार कहने और चिकित्सकीय नियमावली में उल्लेख होने के बावजूद चिकित्सक सस्ती जेनरिक दवाएं नहीं लिखते. 
 2 जेनरिक दवाओं के बारे में जागरूकता कम है. लोग सोचते हैं सस्ती है तो कम असर करेगी, गुणवत्ता पर भरोसा नहीं करते. 
3 चिकित्सक, दवा कंपनियां और इस धंधे से जुड़े दूसरे तत्व अपनी मोटी कमाई को हाथ से निकलते देख इसको हतोत्साहित करनें में लग जाते हैं. 
4 सरकार को जेनरिक दवाओं के प्रचार प्रसार का कोई बजट नहीं है.  


जेनेरिक बनाम ब्रांडेड
तकनीकी तौर ब्रांडेड और जेनरिक दवा में कोई खास अंतर नहीं है. पेटेंट की अवधि बीतने के बाद सभी दवाएं जेनरिक की श्रेणी में आ जाती हैं. कभी-कभी दवा निर्माण कंपनियां इन जेनरिक दवाओं को अपने ब्रांड नाम के साथ बाजार में उतारती हैं. इन्हें ‘ब्रांडेड जेनरिक’ दवाएं कहा जाता है. निजी मेडिकल स्टोर पर ब्रांडेड जेनरिक दवाएं मिलती हैं जो वास्तव में जेनरिक दवाएं ही होती हैं, सिर्फ इनकी कीमत जेनेरिक दवा से बहुत अधिक होती है. सार्वजनिक क्षेत्र, दवा निर्माताओं से दवाएं अनब्रांडेड जेनरिक के रूप में जेनरिक नाम से खरीदता है. सरकार सार्वजनिक अस्पतालों को दवा आपूर्ति करने वाली कंपनियों को महज वैट चुकाना होता है दवा की कीमत में कोई अतिरिक्त लागत नहीं होती इसलिये अस्पताल की वही दवा बाजार से सस्ती होती है जबकि बाजार में ब्रांडेड दवाओं की कीमत में भारी भरकम विज्ञापन खर्च, चिकित्सकों, एजेंटों को दिया जाने वाली राशि और चिकित्सकों को प्रोत्साहन राशि के अलावा भी कई खर्च होने से इनकी बाजार कीमत कई गुना बढ़ जाती है.