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कुशीनगर के कायापलट की तैयारी

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कुशीनगर :
कुशीनगर. सरकार और विश्व बैंक की कोशिशों से कुशीनगर में पर्यटकों संख्या में आशातीत बढोतरी संभव है विश्व बैंक की पहल के बाद सरकार ने भी इस ओर ध्यान देना शुरू किया है तो अब लगता है कि कुशीनगर पर्यटन के नक्शे पर तेजी से चमकेगा. सरकार ने वाराणसी और कुशीनगर के बीच हवाई सेवा को हरी झंड़ी दे दी है. 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सूबे के पर्यटन विकास के मद में हर साल 4 हजार करोड़ रूपये के निवेश का जो लक्ष्य रखा है उसका बड़ा हिस्सा कुशीनगर को भी मिलेगा. स्वदेश दर्शन सर्किट आधारित स्कीम के तहत रामायण सर्किट, कृष्ण सर्किट, बौद्ध सर्किट, आध्यात्मिक सर्किट एवं हेरिटेज सर्किट, कोस्टल सर्किट एवं नार्थ-ईस्ट सर्किट के साथ-साथ बुन्देलखण्ड तथा नैमिषारण्य सर्किट जोडने की कवायद में बौद्ध सर्किट के तहत कुशीनगर को महत्ता मिलनी तय है. बौद्ध सर्किट का पोर्टल बनाने के निर्देश, 200 महिला पर्यटन पुलिस सहित कुल 500 पर्यटन पुलिस की व्यवस्था का प्रस्ताव, 8 भाषाओं-जर्मन, फ्रेंच, जापानी, कोरियन, स्पेनिश, मेन्डरिन, अंग्रेजी एवं हिन्दी में वन-स्टॉप ट्रैवेल सोल्यूशन के साथ 24 घंटे सातों दिन राज्य पर्यटन हेल्पलाइन की व्यवस्था और सबसे बड़ी बात प्रिजर्वेशन ऑफ महायान ट्रेडिशन के तहत मैत्रेय परियोजना को रफ्तार देने की नये सिरे से की जाने वाली कोशिश जिसमें 200 मीटर ऊंची बुद्ध की मूर्ति स्थापित होने के अलावा और भी कई निर्माण होने है, कुशीनगर के पर्यटन का काया पलट कर देगी.
विश्व के सहयोग से कुशीनगर पर्यटकों को सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए पर्यटक सेवा केन्द्र, पर्यटक पुलिस के प्रशिक्षण का प्रबंध, आधुनिक सुविधाएं, पर्यटकों को कुशीनगर के आसपास के दर्शनीय स्थल देखने जाने के लिये टूर पैकेज उपलब्ध कराना यह सब कुशीनगर में घटते पर्यटकों की संख्या में बढोतरी में सक्षम होगा. ध्वनि एवं प्रकाश के संयोजन वाला प्रदर्शन यानी लाइट एंड साउंड शो जो अभी तक दिल्ली के लालकिले, पुराने किले के लिये ही मशहूर था अब कुशीनगर में भी होगा. हर साल कुशीनगर आने वाले लाखों पर्यटक इसके जरिये बुद्ध के इतिहास और उनके जीवन दर्शन से परिचित होंगे, योजना पर करीब 14.50 करोड़ रुपये खर्च आयेगा. हालांकि बौद्ध परिपथ के अनुसार रेल संचालन और उसके तहत श्रावस्ती इत्यादि क्सेत्रों को जोड़ना अभी दूर की बात है पर इसके अलावा भी इस दिशा में की जा रही सरकारी कवायदों से लगता है कि कुशीनगर का भविष्य संवरने वाला है. बौद्ध धर्म को मानने वाला हर व्यक्ति अपने जीवन काल में एक बार कुशीनगर पहुंचकर अपने जीवन को धन्य समझता है.

विश्व के दो दर्जन से अधिक देश ऐसे हैं जहां से हर साल हजारों बौद्ध धर्मावावलम्बी कुशीनगर आते हैं. इसके अलावा पर्यटन के शौकीन देशी और विदेशी लोग भी हर साल बड़ी संख्या में घूमने आते हैं. यह संख्या कई गुना बढ सकती है अगर कुशीनगर को एक संसाधन संपन्न आकर्षक पर्यटन केंद्र के रूप में उचित तरीके से विकसित किया जाये. निस्संदेह इससे देशी विदेशी मुद्रा का आगम भी होगा. नयी सरकार इस संभावना को जानती है इसलिये वह बौद्ध सर्किट और उसमें शामिल कुशीनगर के विकास करने और पर्यटकों को आकर्षित करने की कोशिशों में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रखेगी.    
कुशीनगर में पर्यटक यों तो साल भर आते रहते हैं पर सही मायने में सीजन पन्द्रह अक्टूबर के बाद शुरू होता है और पन्द्रह फरवरी तक चलता है इस दौरान यहां रोज औसतन 400 विदेशी और 1,000 भारतीय पर्यटक आते हैं. बौद्ध उपासक और पर्यटक मुख्य रुप से चीन, थाईलैण्ड, जापान, सिंगापुर, वर्मा, श्रीलंका , भूटान, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, भूटान, तिब्बत, सहित दर्जनों देशों से यहां घूमने आते हैं लेकिन इतने देशों के पर्यटकों के आने के बाद भी कुशीनगर को कोई खास लाभ इसलिये नहीं हो पाता है क्योंकि कि पहली बात कुशीनगर ना तो किसी हवाई मार्ग से सीधे जुड़ा है और ना ही रेल रूट से, कुशीनगर आने वाले अधिकांश पर्यटक या तो बनारस से आते हैं या फिर विहार के बोध गया से, उन्हें अपने गंतव्य पर लौटने की जल्दी रहती है सो बौद्ध उपासक भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण मंदिर में तथागत की लेटी प्रतिमा का दर्शन करने के बाद शाम तक वापस लौट जाते हैं. इसीलिये कुशीनगर में इनके रुकने का औसत काफी कम है.

पर्यटक यहां एक दो दिन भी ठहरें तो यहां का कुछ व्यावसायिक लाभ हो, उनके न ठहरने से पर्यटकों की संख्या बढ भी जाये तो कोई खास फायदा कुशीनगर को नहीं होने वाला. बिहार के बोधगया में पर्यटक औसतन दो–चार दिन रुकते हैं, कुशीनगर में आधा दिन भी नहीं बिताते. जरूरी है यहां न सिर्फ रुकने की पर्याप्त व्यवस्था होनी जरूरी है बल्कि हवाई और रेल रूट से संबद्धता की भी. सरकार यह सब करने को अब उद्धत दिखती है.   
 
कैसे मुस्कुराएं बुद्ध
एक तरफ पर्यटन को बढाने के लिये सरकार प्रतिबद्ध है तो दूसरे तरफ जिसकी वजह से यह सब है यानी बुद्ध के प्रतीक स्थल, उनकी बदहाली और उनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. समय रहते इस बारे में ठोस कदम नहीं उठाये गये तो कई महत्वपूर्ण स्थल देखते देखते ही देखने को भी न बचेंगे. सबसे जरूरी है इन स्थलों को जल जमाव से बचाना. कुशीनगर की खुदाई सन् 1876 में अंग्रेज पुरातत्वविद् कार्लाइल ने आरंभ की थी. यहां से स्तूप निकलने के बाद, आगे भी खुदाई हुई और कई ध्वंसावशेष पाये गये. सन् 1927 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) ने इनका संरक्षण शुरू किया. ये सभी अवशेष सामान्य सतह से नीचे पाए गए. इन्हें वे जहां थे वहीं उसी तरह संरक्षित किया. धीरे-धीरे आसपास विकास हुआ तो वे स्थल सतह से ऊपर उठ कर ऊंचे हो गये. स्मारक नीचे रह गए. नीचे होने के  चलते बारिश में इन स्मारकों के आस पास पानी भर जाता है. यही नहीं कुशीनगर में बुद्ध से जुड़े प्रतीक स्थलों अभी और उत्खनन की आवश्यकता है जिस पर काम नहीं होने से और अधिक पर्यटकों को आकर्षित करने का लक्ष्य अधूरा है. है.

बुद्ध से जुड़े चार अहम स्थल कुशी नगर में हैं, दाह संस्कार स्थल, अंतिम उपदेश स्थल और आसन स्थल यानी तीन को तो खोजा जा चुका है. पर बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद जब उनका दाह संस्कार हिरण्यवती नदी के किनारे किया गया तो दाह संस्कार के बाद उनके अस्थि अवशेषों को जिस जगह बांटा गया, उसे अभी खोजा नहीं जा सका है.यह मिल जाये तो बौद्ध धर्मालुओं के लिये बहुत भावनात्मक आकर्षण का केंद्र मिल जायेगा. पर इस बारे में कोई प्रयास नहीं हो रहा है.