# # # # # # #
लाइव
  • वाराणसी : सिटी स्टेशन पर रेलवे के सिग्नल स्टोर में देर रात लगी भीषण आग, आसपास के घरों में सहमे लोग

कहानी : शब्दहीन

#
गोरखपुर :
रिक्शे के साथ एक नौजवान रिक्शेवाला सुगठित शरीर किसे कहते हैं, यह उसे देखकर ही जाना जा सकता है। मैंने उसे पहली बार देखा तो विश्वास नहीं हुआ कि इस हालत में इतना

छरहरा, लोचभरा, सलोना युवक हो सकता है। वह रिक्शा चला रहा था। अतिसाधारण कुर्ता, वैसा ही पाजामा, पांवों में हवाई चप्पल घिसकर खत्म होने की ओर। नमक उसके चेहरे पर था। साँवला चेहरा, उसपर

काली भौंहों की सघन बरौनियों से घिरी मोहक आँखें और खूबसूरत बाल। जब तक मैं उसके रिक्शे पर बैठा रहा, उसकी पीठ की मांसपेशियों की मछलियाँ लगभग पारदर्शी कुर्ते के भीतर से दिखाई देती रहीं। उतर कर

किराया देने के बाद कुछ पल मेरी आँखें उसके चेहरे पर टिक गई होंगी। उसकी मुस्कान से मुझे ऐसा लगा। उस दिन देर तक मैं सोचता रहा कि ऐसे युवक को शिक्षा या

खेलकूद का प्रशिक्षण या ऐसा भी कोई अवसर क्यों नहीं? लोकतंत्र में ऐसे सवाल क्यों उठें? उसके बाद कई बार उसके रिक्शे पर बैठने के अवसर आए। बातचीत हम दोनों में कुछ खास कभी नहीं हुई। एक मौन

सराहना का भाव दोनों ओर था बस। एक दिन शाम को मेरे सामने आकर वह खड़ा हुआ। रिक्शे से मुझे घर पहुँचाकर चुपचाप चला जाता था। उस दिन पैदल आया था।

कुर्ता- पाजामा, चप्पल वही पुराने। मुँह धुला हुआ, बाल कंघे से सवारे हुए। आँखें मादकता से भरी लजीली मुस्कान से झुकती हुई। कुछ पल खड़ा रहा। मैंने पूछा- क्या बात है? कुछ चाहिए? मुँह से कुछ न बोलकर

वह सिकुड़ सा गया। मध्यवर्गीय ओछापन जागा मेरे भीतर कि कुछ रुपए उधार माँगने आया होगा। पूछा ‘‘रुपए चाहिए? जवाब में उसका झुका हुआ सिर नकार में हल्का सा हिल कर थिर हो गया। फिर क्या

बात है?’’ मेरे कई बार पूछने पर उसने आँखें उठाई। आँखों में संकोच भरा हआ था। चारों ओर देखकर उसने पक्का कर लिया कि हम दोनों को कोई देख नहीं रहा है। उसके बाद कुर्ते की जेब से उसने एक कागज

का टुकड़ा निकाला। फिर उसे दोनों हाथों में पकड़कर सीधा करते हुए उसने मेरे बढ़े हुए दाहिने हाथ में पकड़ा दिया। मैंने लक्ष्य किया कि उसकी उंगलियों जरा सा कम्पन हुआ था। पलभर में उसमें लिखी इबारत

मैंने पढ़ ली। एक सीधी लाइन में बिना किसी सम्बोधन के एक छोटा वाक्य लिखा था- आज रात ग्यारह बजे, दरवाजा खुला रहेगा। नीचे कोई नाम नहीं लिखा था। कोई चित्र भी नहीं बना था।

कागज की लम्बाई उतनी ही थी, जितनी में वह वाक्य एक ही लाइन में आ जाता। उससे थोड़ी कम चैड़ाई। पलभर में इबारत पढ़कर मैंने कागज उलट दिया कि ‘शायद पीछे की ओर कुछ लिखा हो। उधर भी कुछ नहीं

था। मैंने उसकी ओर देखा। उसका सारा अस्तित्व उत्सुकता में बदला हुआ। मेरी चुप्पी से उसकी धड़कन बढ़ गई। लड़खड़ाता हुआ बोला- ‘‘क्या लिखा है?’’ तब मैं समझ सका कि वह अनपढ़ है।

मैंने कुछ भी न समझते हुए उसे पूरा वाक्य ज्यों का त्यों पढ़कर सुना दिया- ‘आज रात ग्यारह बजे, दरवाजा खुला रहेगा।’ कागज से उठकर मेरी निगाह उसके चेहरे पर गई-यह क्या? इतना लाल कैसे हो

गया इसका साँवला सलाना चेहरा? मैं कुछ पूछता उससे पहले ही उसने मेरी उंगलियों में फँसा वह कागज खींच लिया और लगभग भागता हुआ वापस चला गया। मैं कुछ देर तक सोचता खड़ा रहा, किसका लिख हुआ हो सकता है? कोई अपराध का मामला है क्या? दो चार मिनट बाद उस बात को

भूलकर अपने काम में लग गया। वह कई दिन तक दिखाई नहीं पड़ा। एक दिन दिखाई पड़ा, एकदम सामने से आता हुआ रिक्शे पर कोई सवारी बैठी थी। मेरी ओर देखते ही वह मुस्कराया। मुझे लगा, उसकी

मुस्कान में लजाकर बच निकलने का भाव था। फिर अगली बार मिला तो खाली रिक्शा लिए था, किन्तु पहले की तरह ललक कर मेरे पास आकर खड़ा होने की जगह एक दूरी बनाये रहा। एक बात की ओर मेरा

ध्यान गया। उसके कपड़े बदल गए थे। पावों में नई हवाई चप्पल, सस्ती जीन्स और टी ‘शर्ट। बालों में वैसी ही चमक। गौर से देखा तो चेहरा कुछ भरा भरा सा तृप्त सा लगा। पास जाकर पूछा- ‘कैसे हो?’ साफ

लजा गया सुनकर। हड़बड़ी में रिक्शे की सीट की ओर इशारा करके बोला- ‘आइए’। मैं बैठ गया। धीरे-धीरे सहज होता गया। अब जब भी मिलता, मस्ती कुछ बढ़ी हुई लगती।

एक दिन वैसा ही लजाता हुआ आया, जैसे पहली बार कागज लेकर आया था। इस बार मुझे कुछ पूछने की जरूरत नहीं पड़ी। इधर-उधर देखकर उसने पहले की तरह एक कागज जेब से निकाल कर अपने दोनों

हाथों से सीधा किया और मेरे हाथ में रख दिया। मैंने तुरंत उसे पढ़ा। उसी तरह बिना किसी सम्बोधन के दो वाक्य लिखे हुए थे। लिखावट पहले वाली ही थी। नीचे कोई नाम नहीं लिखा था। कहीं पर कोई संकेत

नहीं था। पीछे की ओर कागज एकदम कोरा था। मैं इस बार भी कुछ विशेष समझ नहीं सका। दोनों वाक्य पढ़कर उसे सुनाते हुए सहम गया, उसके चेहरे की ओर देखकर। दोनों वाक्य थे-’ मेरे वालिद जान गए हैं,

अब कभी मत आना। दिन डूबने से पहले शहर छोड़ दो। उनसे तुम्हारी जान को खतरा है। पहले की तरह उसने कागज मेरे हाथ से लिया और चुपचाप चला गया। इस बार उसकी चाल में पस्ती थी। किस चक्कर में फँस गया यह

सीधा अल्हड़ युवक? कई दिन तक मेरी चेतना पर यह बोझ बना रहा। धीरे-धीरे बात पुरानी पड़ गई। वह ‘शहर छोड़कर जा चुका था क्योंकि उसके बाद फिर कभी दिखाई नहीं पड़ा।

आज वह दिखा, पहले की तरह मस्ती में झूमता हुआ। नए कपड़े, नया रिक्शा, चेहरा खिला हुआ। एकाएक सामने आकर उसने पहली बार मुझे देखकर ‘सलाम’ कहा। इससे पहले वह सिर्फ मुस्कराता था। इस

बीच वह पुराना घर छोड़कर ‘शहर के दूसरे छोर पर रहने लगा था। बहुत अच्छा लगा उसका सलाम। मैंने पूछा- कैसे हो? कहाँ रहे अब तक? कैसा खतरा था वह जो कागज में लिखा था? सारे सवाल सुनकर

वह मुस्कुराया। रिक्शे की ओर इशारा करके उसने कहा, चलिए पहुँचा दें? मुझे अभी घर नहीं लौटना था, मगर रिक्शे पर बैठ गया और घर आ गया। उसे रोकर बिठाया। वह भी समझ गया कि मैं उसकी कहानी

सुने बिना मानने वाला नहीं। इस बार उसकी आँखों में बार-बार उमड़ आने वाले संकोच का भाव बिल्कुल नहीं था। प्रौढ़ता से उपजा आत्मविश्वास था। मैंने पूछा- ‘किससे तुम्हें जान का खतरा था? उसके

मुख पर लाज की लाली फिर दौड़ गई, परन्तु तुरन्त सहज होकर उसने बताया- ‘अब कोई डर की बात नहीं। उसकी ‘शादी हो गई। अपने घर में ‘सुखी है वह। मैं उसे खुश देखकर खुश हूँ।’

लेखक : रामदेव शुक्ल