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और कितनी कुर्बानियां

स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी अक्षमता एक बार फिर खुलकर सामने आई है. फर्रूखाबाद के सरकारी अस्पताल में 49 शिशुओं की मौत प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर बेहद गंभीर सवाल खड़ा करने वाला है. मुख्यमंत्री ने जांच के आदेश दे दिये हैं, पर इससे इस सवाल का जवाब नहीं मिलता कि ऐसा बार बार क्यों हो रहा है. महीना भर पहले गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में भी ऑक्सीजन की कमी से 70 से अधिक बच्चों की मौतें हुई थी. तब कहा गया था कि ये मौतें ऑक्सीजन की कमी से नहीं, बीमारियों से हुई हैं. इस बार भी भी इन मौतों के पीछे ऐसे ही कई तर्क दिये जा रहे हैं.

चिकित्सकीय लापरवाही को मेडिकल तकनीकि शब्दों में उलझाना बहुत पुराना शगल है. देश में तमाम चिकित्सकीय उपेक्षा के मामले इन्हीं तकनीकि शब्दावली के झमेले में फंस कर किसी सुतर्किक फैसले तक नहीं पहुंच पाते. इस बार ज्यादातर की मौतों का कारण 'पैरीनेटल एस्फिक्सिया' बताय जा रहा है. कहा जा रहा है कि बच्चो को गर्भनाल से ही खून की पर्याप्त आपूर्ति नहीं मिल पाई. इसी तरह के तमाम दूसरे तर्क दिये जा रहे हैं. पैरीनेटल एसिक्सिया कोई संक्रामक महामारी नहीं है जो अचानक इतने कम समय में इतने बनवजातों में देखी जाये. जाहिर है कारण कुछ और है जो जांच के बाद सामने आयेगा. मेडिकल से जुड़े मामलों की जांच भी बहुत पेचीदा और तकनीक से जुड़ी होती है और हमारे पास ऐसे विशेषज्ञ जांचकर्ताओं की कमी है. ये जांचकर्ता अमूमन चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़े होते हैं कई बार उनकी भूमिका अपने वर्ग के प्रति झुकाव रखने वाली भी साबित होती है.. गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के मामले में जहां 70 से अधिक बच्चे मारे गये थे उनके दोषी हिरासत में हैं. पर उनको सजा भी होगी अभी यह कहना मुश्किल है. उनको सजा हो भी जाये तो इससे क्या फर्क पड़ेगा. जब इतने बड़ी लापरवाही उजागर होने के बावजूद तंत्र जरा भी सचेत नहीं होता और उसी दौरान दूसरी जगह पर वैसी ही अक्षमता पायी जाती है.

मीडिया ने इस बात के लिये भरसक चेताया भी था कि प्रदेश के दूसरे बड़े सरकारी अस्पतालों में भी इस तरह के दर्दनाक हादसे हो सकते हैं पर उन सूचनाओं पर कोई कान नहीं दिया गया. एक बड़ी दुर्घटना के बाद जहां पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को सचेत होना चाहिये वहां एक दूसरे पर दोषारोपण, अपना पल्ला झाड़्ने और जिस तरह की लीपापोती की प्रक्रिया शुरू हुई उससे साफ था कि सरकार इस समस्या के हल के लिये किसी सकारात्मक पहल की हामी नहीं दिखती. वह कार्यवाई की घोषणा की बात कह कर आगे बढ जाना चाहती है. कचरे को दरी के नीचे डालने का परिणाम ठीक नहीं होता. ऐसा ही फर्रुखाबाद वाले ममले में हुआ. फिलहाल जांच से कुछ सामने आये न आये वास्तविक दोषियों को सजा मिले न मिले पर बच्चे अपनी जान से हाथ धो चुके हैं. प्रश्न है कि व्यवस्था के इस बलिवेदी पर कितनी कुर्बानियां होती रहेंगी. आखिर कितने बलिदानों को लेने के बाद यह व्यवस्था सुधरेगी.