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अपराध वृद्धि को ऐसे देखें

सूबे में अपराध जो कभी काफी उठान पर था वह लगातार घटता जा रहा है. अपराधों  की यह घटोतरी साफ साफ दिखेगी पर इसको देखने के लिये मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नजर से चाहिये. उन्होंने कहा है कि जनता को लग रहा होगा कि अपराध बढ़ रहे हैं पर सच यह है कि अपराधों की संख्या लगातार कम हो रही है. उनके उप मुख्यमंत्री ने सलाह दी की आंकड़ों पर मत जाएं जमीनी हकीकत देखें. चूंकि अब सबके साथ न्याय करना है सो सारे मामले दर्ज हो रहे हैं इसलिये लग रहा है कि संख्यात्मक तौर पर अपराध बढ रहे हैं. दरअसल जनता वही समझती है जो उसे सामने दिखता है या मीडिया के जरिये देख पाती है. मीडिया प्रदेश में लगातार अपराध की खबरों की बाढ़ और उनके बढ़त वाले आंकड़े प्रसारित, प्रकाशित होने से यह छवि बन रही है कि उत्तर प्रदेश में अपराध दिनोंदिन बढ रहे हैं और सरकार काबू पाने में विफल रही है. सरकार ने अपराध पर नियंत्रण पाने के लिये कोशिशें तो की हैं. खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपराधियों को कड़ी चेतावनी वाले कई बयान दिये, अपराधियों को शह देने वालों पर भी नकेल कसने की बात कही गयी. बड़े माफियाओं की जेलें बदली गयीं ताकि वे जेल से अपने कार्य व्यापार न चला सकें. हालांकि उनकी कारगुजारी इस पर भी बदस्तूर जारी ही रही. यह भी कहा कि अपराधी प्रदेश से बाहर चले जायें प्रदेश में अपराधियों की खैर नहीं. पुलिस के आला अधिकारियों में कई फेरबदल किये गये. मुलिस महानिदेशक तक को बदल दिया. 

जाहिर है, सरकार भीतर ही भीतर यह जानती है कि अपराध बढ़ रहे हैं और उसपर काबू नहीं पाया जा सका है. सरकर ने आते ही महिलाओं के खिलाफ अपराध कम करने की कोशिश की पर उसका नतीजा यह है कि पिछली सपा सरकार के मुकाबले योगी सरकार में महिलाओं के प्रति अपराधों में 17 फीसद की बढोतरी हो चुकी है. महिलाओं के प्रति हुए अपराधों का निस्तारण जहां सपा सरकार में 91 प्रतिशत रहा वहीं मौजूदा सरकार का प्रदर्शन केवल 27 फीसद ही है. सरकार अब तक भांप चुकी है कि केवल बयानों से अपराध पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता न ही अपराधियों को उनके मंसूबों को पूरा करने से रोका जा सकता है. आखिर सरकार को यह बोध न होता तो वह इतने सारे प्रयास क्यों करती या फिर यूपीकोका जैसा सख्त कानून लाने के लिये मसविदा क्यों पेश करती.सरकार प्रदेश को अपराधमुक्त और भयमुक्त बनाने के लिए संकल्पित है. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता पर वह अपने संकल्प के लिये क्या कुछ कर रही है यह भी देखना जरूरी है क्योंकि अगर कुछ सार्थक है तो वह है परिणाम , जबानी संकल्प नहीं. जहां तक परिणाम का सवाल है वह न तो आंकड़ों की शक्ल में दिख रहा है न ही व्यावहारिकता के ठोस धरातल पर. सरकार अपने प्रयासों की विफलता के बाद अब जनता का ध्यान अपराधों की बढ़त से हटाने के लिये बयान तकनीक का इस्तेमाल कर रही है.