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मिशन यूपी : टिकट बँटवारे का ब्लू प्रिंट है BJP चुनाव समिति के समीकरण!

By Shakti Prakash Shrivastva on January 7, 2022
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

                  विधानसभा चुनाव में यूपी बीजेपी ने अपनी चुनाव अभियान को लक्ष्य भेदी बनाने के लिए उन्नीस सदस्यीय चुनाव समिति बनाई है। जिस तरह से समिति में जातीय समीकरणों को और क्षेत्रीय समीकरणों को साधते हुए चुन-चुन कर नाम रखे गए है उससे काफी हद तक पार्टी का वह फार्मूला स्पष्ट होते दिख रहा है जिसका पार्टी आने वाले चुनाव के लिए टिकटों के वितरण में इस्तेमाल करने जा रही है। मसलन पूरी समिति के सदस्यों के क्षेत्र और जातियों का सूक्ष्म विश्लेषण करे तो ऐसा लगता है कि पार्टी इस बार पिछड़ों और अति पिछड़े संवर्ग के जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए ही टिकटों का बंटवारा करेगी। यानि कि इन्ही जाति विशेष के चेहरों पर पार्टी दांव लगाने के मूड में है। वैसे तो अतीत के आंकड़ों पर गौर करें तो पार्टी को क्या लोकसभा क्या विधानसभा सभी में सवर्णों और व्यापारियों का भरपूर समर्थन मिलता रहा है लेकिन इस बार ऐसा लग रहा है कि पार्टी को सवर्णों खासकर ब्राह्मणों का पूर्ण समर्थन मिलने में संशय लग रहा है। यही वजह है कि पार्टी को राज्यसभा सांसद शिव प्रताप शुक्ल की अगुवाई में ब्राह्मण मंत्रियों-सांसदो की एक सोलह सदस्यीय टीम बनानी पड़ी है जो इस संशय की खाई को पाटकर पुनः पूर्व की भांति ब्राह्मणों का विश्वास हासिल कर सके। ब्राह्मणो के इस लानत-मनालत के प्रयास के बीच पार्टी को अहसास हुआ कि यदि पिछड़ा और अति पिछड़ा व दलित आदि जातीय संवर्गों का रुझान पार्टी की ओर हो जाये तो शेष कमियों की इससे पूर्ति की जा सकती है। सो पार्टी इसी को ध्यान में रखते हुए चुनाव समिति में मुख्यतः जिन 19 चेहरों को शामिल किया है वो सभी जातिगत समीकरणों को साधते हुए नजर आ रहे हैं। इसमें आठ पिछड़े और अति पिछड़े शामिल हैं। जिसमें जाट, कुर्मी, मौर्य, लोध, शाक्य और मछुआ समेत अन्य पिछड़ी बिरादरियों का प्रतिनिधित्व शामिल किया गया है। जो कि समिति का 42 फीसदी हिस्सा हैं। इसी समिति में तीन दलित चेहरे भी हैं और तीन ब्राह्मणों के अलावा दो वैश्य चेहरे भी हैं। चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी का यह जातीय फार्मूला आने वाले समय में टिकट वितरण का फार्मूला बन सकता है। प्रदेश चुनाव समिति में प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा केशव फसाद मौर्य, दिनेश शर्मा, सुनील बंसल, अरुण सिंह, बेबी रानी मौर्य, डॉ रमापति राम त्रिपाठी, साध्वी निरंजन ज्योति, रेखा वर्मा, कर्मवीर सिंह, ब्रजेश पाठक,संजीव बालियान, विनोद सोनकर, राजवीर सिंह, डॉ एस पी सिंह बघेल, सलिल बिशनोई, अश्विनी त्यागी, सुरेश खन्ना, गीता शाक्य, राधा मोहन सिंह, संजीव चौरसिया, सुनील ओझा, वाई सत्य कुमार शामिल है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि समिति में सदस्यों का चयन न सिर्फ जातिगत आधार को साधते हुए किया गया है, बल्कि क्षेत्रीय समीकरण भी साधे गए हैं। पार्टी ने जिस तरीके से पश्चिम में जाटों के समीकरण को साधते हुए संजीव बालियान और कर्मवीर सिंह को चुनाव समिति में रखा है, उससे ऐसा लगता है कि पार्टी  किसान आंदोलन के दौरान हुए नुकसान की भरपाई को पूरा करने की कोशिश कर रही है। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह के समिति में आने से ओबीसी को न सिर्फ प्रतिनिधित्व मिला है, बल्कि आने वाले विधानसभा के चुनाव में टिकट बंटवारे के दौरान उनकी हिस्सेदारी भी हो सकती है। दलितो को साधने के लिहाज से बेबी रानी मौर्य को चुनाव समिति में लाकर यह संदेश भी देने की कोशिश की गयी है कि राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेता किस तरीके से उत्तर प्रदेश की चुनाव समिति में अपना अहम योगदान निभा रहे हैं। केशव प्रसाद मौर्य के साथ-साथ प्रयागराज इलाके के कौशांबी से सांसद विनोद सोनकर को लाकर पार्टी जाति समुदाय में अलग संदेश दे रही है।  नाराज ब्राह्मणों को साधने के लिए कैबिनेट मंत्री बृजेश पाठक को जहां अहम स्थान दिया गया है वही कुर्मी वोटरों को साधने के लिए पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रेखा वर्मा को भी समिति में शामिल किया गया है। पार्टी के जानकार भी इस बात का कयास लगा रहे है कि चुनाव समिति जिस तरह तैयार की गई है संभव है टिकटों का बंटवारा भी वैसे ही होगा। ऐसे में बिल्कुल साफ है कि भाजपा ने अपनी चुनाव समिति के माध्यम से 2022 में होने वाले विधानसभा के चुनावों में टिकट बंटवारे का फिलहाल ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया है।


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