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यूपी : विधानसभा चुनाव-2022 के सिकंदर योगी आदित्यनाथ!

By Shakti Prakash Shrivastva on September 5, 2021
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

उत्तर प्रदेश में आसन्न विधानसभा चुनाव के बाबत एक चुनावी सर्वे ने इस बात का संकेत दिया है कि एक बार फिर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनेगी। चूंकि बीजेपी पार्टी हाईकमान समेत अधिकांश छोटे-बड़े नेताओं ने भी यह मान लिया है कि सत्ता मिलने पर बागडोर भी पुनः एक बार योगी आदित्यनाथ के हाथों ही होगी। यानि योगी आदित्यनाथ पुनः यूपी के मुख्यमंत्री होंगे। हालांकि विस्तार से इसे समझने के लिए मौजूदा उस राजनीति को थोड़ा समझना होगा। जिस राजनीति के लिए कहा जाता है कि इसका न कोई धर्म है न कोई जाति और न ही कोई ईमान। लब्बोलुआब ये कि इसमें जो जीता वही सिकंदर। राजनीति का सबसे बड़ा मापदंड लोकतन्त्र में चुनाव है। इसमे विजय-पराजय से न केवल सरकारें बनती-बिगड़ती हैं बल्कि राजनीति की परिभाषाएँ भी गढ़ी और मिटाई जाती हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा सुप्रीमो मायावती और उनकी राजनीतिक पार्टी बसपा (बहुजन समाज पार्टी) के उद्भव-पराभव से काफी हद तक इस बात को समझने में आसानी होगी। जब शुरुआती चुनाव में मायावती की पार्टी ‘तिलक-तराजू और तलवार, इनको मारों जूते चार’ के नारे के साथ उतरी तो विजयी हुयी और सरकार का सेहरा माथे टंगा। पार्टी को दलित-पिछड़ों का प्रचंड समर्थन मिला और माना जाने लगा कि मायावती पर प्रदेश के दलितों का अगाध विश्वास है। चूंकि परिणाम पक्ष में रहे लिहाजा इसको चहुं ओर राजनीतिक और गैर राजनीतिक गलियारे में मान्यता भी मिली। लेकिन स्थायी आवरण बनने से पहले जैसे ही कुछ चुनाव बीते पार्टी की यह मान्यता भी बदलने लगी। पार्टी को सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला लाना पड़ा। नारा यह कहना पड़ा कि ‘हाथी नहीं गणेश है ब्रह्मा विष्णु महेश’ है। इस बदले नारे ने भी बढ़त दिलाई। प्रदेश में सरकार बनी। समय के साथ-साथ जैसे जैसे परिभाषाएँ बदली मतदाताओं की आस्थाएं भी बदलीं। कानून-व्यवस्था के नाम पर प्रदेश की सत्ता से दूर हुई पार्टी समाजवादी पार्टी पुनः सरकार पर काबिज हुई। कानून-व्यवस्था संबंधी नाकामियों के दुरुस्तीकरण और विकास की नित नयी गढ़ी जा रही परिभाषाओं के चलते पार्टी धीरे-धीरे चाल-चरित्र और चेहरा बदलने में लगी ही थी कि पारिवारिक कलह ने सिर उठा लिया और जो कुछ बनना था वो बनने से पहले बिगड़ गया। नतीजतन ये हुआ कि सांप्रदायिकता के नाम पर विपक्षियों द्वारा हाशिये पर रखी जाने वाली पार्टी बीजेपी (भारतीय जनता पार्टी) सत्ता में आई और वो भी पूर्ण बहुमत के साथ। हालांकि इसमें धार्मिक मान्यताओं और भावनाओं का बड़ा योगदान रहा। मसलन रामजन्म भूमि पर वर्षों से चल रहे विवाद का शांतिपूर्वक विधिसम्मत हल निकालने का श्रेय। जनमानस में ये बात घर कर गयी कि यह दल न केवल हिन्दुत्व की पोषक है बल्कि राष्ट्रीयता की भी संरक्षक है। ऐसे में जबकि उत्तर प्रदेश में एक बार फिर विधानसभा चुनाव सामने है। 2022 के मार्च में संभावित इस चुनाव को लेकर राजनीतिक गलियारे में बहस शुरू हो गयी है कि इस बार सत्ता की कुर्सी पर कौन। सत्ताधारी बीजेपी सरकार पर दंभी होने का दाग चस्पा हो रहा है। विपक्षियों का यह आरोप है कि सरकार में जहां कई दर्जन विधायक सदन में विरोध जाहिर कर चुके है, मंत्री-सांसद और विधायक तक बेबस होने का रोना मीडिया के सामने रो चुके है वहाँ बिना किसी फेरबदल सरकार चल रही है जबकि इससे कम विपरीत परिस्थियों पर बगल के राज्य उत्तराखंड में दो-दो बार सत्ताधीश यानि मुख्यमंत्री बदल दिये गए। वही दूसरी तरफ प्रदेश में मजबूत विपक्ष के तौर पर सत्ता में वापसी की प्रबल दावेदार सपा खासकर उसके मुखिया अखिलेश यादव अपने इस अति आत्मविश्वास में किलोले भर रहे है कि उनके लिए सत्ता महज चंद कदम की दूरी पर है। अखिलेश यादव अपने चंद अनुभवहीन और नासमझ सलाहकारों के इस सलाह पर गदगद है कि प्रदेश की मौजूदा सरकार से त्रस्त जनता के पास अखिलेश के अलावा कोई विकल्प नहीं है। यही भ्रम वाला आत्मविश्वास अखिलेश को जमीन पर उतर कर वह प्रयास नहीं करने दे रहा है जिसे करके ममता बनर्जी ने बंगाल में बीजेपी के जबड़े से सत्ता की चाभी झपट ली थी। अखिलेश की पुनर्वापसी बगैर ऐसे जमीनी प्रयास के संभव नहीं है। अखिलेश के अलावा प्रदेश में जो विकल्प रूपी पार्टियां थी जैसे बसपा, वो महज प्रयास के नाम पर प्रयास करते दिख रही है। कांग्रेस ईमानदारी से प्रयास तो कर रही है मगर उसके पसीना बहाने वाले ये प्रयास भी कम से कम इस विधानसभा चुनाव में तो कोई उल्लेखनीय परिणाम नहीं दिलाने जा रहे हैं। अभी तक के मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम और जमीनी विश्लेषण यही संकेत दे रहे है कि यदि सपा  सुप्रीमो अखिलेश यादव का तेवर बंगाल की ममता की तरह जमीन पर नहीं दिखा तो सारे बहस-मुबाहिसे के बीच एक बार फिर प्रदेश में विरोध और आक्रोश के बावजूद बीजेपी की सरकार पुनर्वापसी करेगी। प्रदेश में लगातार दुबारा सत्तासीन होने का रिकार्ड भी बीजेपी के नाम दर्ज होगा और जो जीता वही सिकंदर के रूप में प्रदेश मे एक बार फिर योगी आदित्यनाथ प्रदेश के सिकंदर बनेंगे।

 


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