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UP चुनाव में बीजेपी की सियासत ! एक दूसरे के कोर वोट को साधने में ही उलझ गया है विपक्ष

By Shakti Prakash Shrivastva on July 16, 2021
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

उत्तर प्रदेश में विधान सभा के चुनाव होने में महज कुछ महीने शेष हैं। ऐसा राजनीति में देखा गया है कि जब चुनाव नजदीक होते है तो विपक्षी राजनीतिक दल सरकार की विफलता वाले महत्वपूर्ण मुद्दों को आधार बना कर उनके खिलाफ सड़क से लेकर सदन तक में घेराबंदी करते हैं। हर जगह ये प्रमाणित करने की कोशिश करते हैं कि सरकार जनहित के मुद्दों पर फेल रही है। लेकिन पहली बार उत्तर प्रदेश में ऐसा देखा जा रहा है कि आसन्न चुनाव के बावजूद विपक्ष पूरी तरह चुनावी लय में नहीं है। बल्कि प्रदेश की तीनों महत्वपूर्ण राजनीतिक दल सपा, बसपा और कांग्रेस जो हैं ये सत्ताधारी दल के खिलाफ मोर्चा खोलने की बजाय आपस में ही एक-दूसरे के कोर वोट को साधने में लगे हुए हैं। इस सधने-साधने के खेल में देखना है कि बाजी किस के हाथ लगती है लेकिन इससे एक बात तो साबित हो रही है कि विपक्षियों के इस ट्रिएंगली रस्साकसी में यूपी चुनाव की बाजी पुनः सत्ताधारी बीजेपी की ओर सरक सकती है।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव अगले साल मार्च के पहले होने है। इसको लेकर सताधारी से लेकर विपक्ष तक के राजनेताओं की सरगर्मियाँ बढ़ गयी हैं। सत्ताधारी बीजेपी जल्द से जल्द ऐसी परियोजनाओं को पूर्ण कर उनका लोकार्पण करा लेना चाहती है। जिससे चुनाव में उनके आधार पर विकास की कहानी का कथानक लिखा जा सके। वही जो सपा, बसपा और कांग्रेस जैसे राजनीतिक दल है उनमें अभी तक कोई विशेष रणनीति अभी तक बनती नहीं दिख रही है। इनमे आपसी सियासी तालमेल होते भी नहीं दिख रहा है। हल्लाबोल जैसे आक्रामक तेवर रखने वाली सपा भी अभी बहुत कुछ तेवर नहीं दिखा सका है। हालांकि पंचायत चुनाव में हुई हिंसा को आधार बनाकर सरकार का विरोध करने के लिए इसके कार्यकर्ता गुरुवार को पहली बार हल्ला बोलने सड़क पर उतरे लेकिन कुछ एक जिलों को छोड़ कहीं बहुत आक्रामकता नहीं दिखा पाये। अलबत्ता सपा की निगाह बसपा के हार्डकोर वोट बैंक दलितों को साधने में जरूर लग गया है। इस क्रम में सपा अब लोहिया वाहिनी की तर्ज पर बाबा साहब वाहिनी बनाने जा रही है। इतना ही नहीं अब पार्टी के राजनीतिक पोस्टरों में भी लोहिया, मुलायम के साथ बाबा साहब अंबेडकर की तस्वीर लगाई जाएगी। पिछले दिनों दिवाली को सपा ने दलित दिवाली के रूप में मना कर संकेत दे ही दिया था। सपाई इस समय असंतुष्ट बसपाइयों को भी साधने में लगे है। उनको विश्वास है कि पार्टी के मौजूदा स्थिति में अपने भविष्य के प्रति सशंकित बसपाई नेता सपा के साथ आ सकते है। सपा का मानना है कि ऐसे कुछ बसपाइयों के आ जाने से उनका काम थोड़ा आसान हो सकता है। अखिलेश मानते हैं कि किसी तरह प्रदेश के 22 फीसद दलित मतदाताओं का साथ उन्हे मिल गया तो सत्ता की चाभी भी मिला ही मानिए। वहीं कांग्रेस सपा के मुस्लिम और बसपा के दलित वोटरों को आकर्षित करने में लगी हुई है। प्रदेश में पार्टी को पुनर्जीवित करने की ज़िम्मेदारी पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी के कंधों पर है। प्रियंका मानती है हैं 1990 तक जो मुस्लिम उनके साथ रहा आज वो कभी सपा तो कभी बसपा का साथ देता रहा और कांग्रेस से दूरी बना ली। प्रदेश के इन्ही 20 फीसद मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर फिर से करने के लिए पार्टी एड़ी-चोटी लगा रही है। अल्पसंख्यक मोर्चा इन दिनों प्रदेश भर के उलेमाओं-मदरसों के संपर्क में हैं। उन्हे ये समझाने की कोशिश की जा रही है कि सीएए और एनआरसी जैसे मुद्दों पर जब सपा-बसपा कही नहीं दिखे वहाँ सिर्फ कांग्रेस ही खड़ी रही। यह भी विश्वास दिलाया जा रहा है कि बड़ी संख्या में मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट भी दिया जाएगा साथ ही उनके मुद्दे चुनावी घोषणा पत्र में भी शामिल किए जाएंगे। प्रदेश में राजनीतिक साख की बात की जाए तो 2012 से बसपा का ग्राफ लगातार गिरते हुए 2017 के विधान सभा चुनाव में न्यूनतम तक पहुँच गया। अब इस चुनाव में बसपा भी पूरी तरह केन्द्रित हो गयी है सपा के ओबीसी और मुस्लिम वोट बैंक पर। बसपा सुप्रीमो लगातार लखनऊ में कैंप कर रही है। सेक्टर प्रभारियों को स्पस्ट  निर्देश दिये गए है कि अपने इलाके में जुझारू ओबीसी प्रत्याशियों का चयन करें। पार्टी हर जिले में कम से कम दो ओबीसी प्रत्याशी उतारना चाहती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी अधिक संख्या में मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट देने का मन बना रही है। बसपा की प्लानिंग से ऐसा लगता है कि उसका टार्गेट बीजेपी न हो कर सपा है। प्रदेश के तीनों प्रमुख विपक्षी दलों की स्थिति देख ऐसा लगता है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में एक तरह से विपक्षी योगी सरकार को आसन्न विधानसभा चुनाव में वाक ओवर देने जा रहे हैं।

 


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