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यूपी का सियासी पारा : कोरोना के अलावा भी बहुत कुछ नहीं है शांत, सरकार में हो सकता है बदलाव!

By Shakti Prakash Shrivastva on May 27, 2021
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

पिछले कुछ दिनों से प्रदेश में जिस तरह की गतिविधियां हुई हैं या हो रही हैं उसे देखकर कहा जा सकता है कि कोरोना संक्रमण से जूझ रहे उत्तर प्रदेश में कोरोना के साथ-साथ बहुत कुछ शांत नही है। ऐसा लगता है कि प्रदेश में बड़े बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है। ऐसा सरकार और संगठन दोनों ही स्तर पर संभव है। हालांकि राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा, बैठने से पहले कहना जल्दबाज़ी होगी।

संघ सरकार्यवाह का लखनऊ पहुंचाना, केशव मौर्य को दिल्ली बुलाना, राज्यपाल को दौरे से वापस बुलाना…

राज्य में कोरोना और ब्लैक फंगस जैसी बीमारी संबंधी चल रही तैयारियों के बीच क्या कुछ और हो रहा है इसे जानने के लिए कुछ घटनाक्रम को सिलसिलेवार गंभीरता से समझना होगा। कुछ महीनों पहले काफी शोर शराब के बीच ब्यूरोक्रेट से राजनेता बने पीएम मोदी के अतिप्रिय ए के शर्मा को जिस अंदाज में विधान परिषद की सदस्यता देते हुए लखनऊ में महत्व दिया गया और मीडिया प्रस्तुति हुई वो किसी अन्य विधान परिषद सदस्य के लिए सपना सरीखा है। बहरहाल तेज चर्चा उप मुख्यमंत्री बनाने की हुई लेकिन वो न होकर पीएम संसदीय क्षेत्र वाराणसी के केयर टेकर हो कर रह गए। समय बीता कोरोना की दूसरी लहर में उन्होने क्षेत्र मे इतना बढ़िया काम किया जिसकी पीएम नरेंद्र मोदी ने गुजरात तक में की। पिछले हफ्ते अचानक एक दिन ए के शर्मा बरास्ते दिल्ली लखनऊ पहुँचते है वहाँ अलसुबह मुख्यमंत्री आवास पर उनकी और मुख्यमंत्री की गहन मंत्रणा होती है। मीडिया में इस बाबत कुछ सुगबुगाहट होती है। इसी बीच संघ के अति वरिष्ठ सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले लखनऊ पहुँचते है और इसी बीच योगी आदित्यनाथ से शुरू से ही बहुत मेल न रखने वाले उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को दिल्ली तलब कर लिया जाता है। इसके बाद चल रही चर्चा को गति मिलने लगती है कि अब सरकार व संगठन में कुछ न कुछ होगा, ऐसी अटकले जमीन पकड़ने लगती हैं। अचानक गुरुवार को मध्य प्रदेश के दौरे पर गयी राज्य की राज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन पटेल (मध्य प्रदेश का भी चार्ज है) को आनन फानन में वापस लखनऊ बुलाया जाता है और देर शाम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ बैठक तय होता है।

विधानसभा चुनाव नजदीक

ऐसे में अचानक घट रहे इन घटनाक्रमों ने चर्चाओं को और मजबूती देने लगीं। राजधानी में सचिवालय सहित कई विभागों में हलचल सी मच गयी है। अब जबकि उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में अब महज आठ महीने शेष हैं, संभव है पार्टी के जिम्मेदारों को लगा कि ऐसा कुछ होना चाहिए। और शायद इसी वजह से ऐसा कुछ होते दिख रहा है। लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार राजेश सिंह श्रीनेत भी ऐसा ही मानते है कि यह तेजी कुछ न कुछ गुल खिलाएगी। कुछ परिवर्तन तो होगा। परिवर्तन में ऐसा माना जा रहा है कि बीजेपी एक बार फिर केशव प्रसाद मौर्य के रूप में प्रदेश अध्यक्ष पद पर ओबीसी कार्ड खेल सकती है और ब्यूरोक्रेसी पर चुनावोंपयोगी नियंत्रण के लिए ए के शर्मा को चर्चा के मुताबिक उप मुख्यमंत्री पद दे सकती है। 19 मार्च 2017 को सरकार गठन के बाद 22 अगस्त 2019 को उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अपना दूसरा मंत्रिमंडल विस्तार किया था। उस दौरान उनके मंत्रिमंडल में 56 सदस्य थे। कोरोना के चलते तीन मंत्रियों के निधन के बाद अब कुल 53 सदस्य ही है।

कुछ नए जुड़ तो कुछ बिछुड़ भी सकते हैं…

अतः ऐसा लग रहा है कि इस विस्तार में जहां कुछ नए चेहरों को स्थान मिलने की संभावना है वहीं कुछ की छुट्टी भी की जा सकती है। हाल ही में गरीब कोटे से अपने भाई की यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर बनवाने और करोड़ों की जमीन लाखों मे रजिस्ट्री कराने जैसे विवादो के चलते सुर्खियों मे रह कर सरकार की किरकिरी कराने वाले बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री डॉ सतीश द्विवेदी को भी बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। कोरोना महामारी में कोरोना से उपजे असंतोष और पंचायत चुनाव में मिली हार के बाद से भाजपा की चिंता अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर अगर है तो लाजिमी है। चुनावी साल होने के चलते योगी सरकार की कैबिनेट में कुछ नए लोगों को शामिल कर प्रदेश के सियासी समीकरण को साधने का दांव चल सकती है। ऐसा उचित भी है लेकिन अभी फिलहाल सब कयासो में ही।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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